मुंबई की बरसात में पड़ोसन थी साथ में

(Mumbai Ki Barsat Me Padosan Thi Sath Me)

यदि आप मुंबई में रहते हो.. तो बरसात के मौसम में मुंबईकरों की क्या हालत होती है.. ये अच्छी तरह से जानते होंगे।
यदि आप मुंबई के बाहर भी रहते होंगे तो न्यूज चैनल पर बारिश का कहर देख ही चुके होंगे।

यह कहानी ऐसी ही एक बरसाती रात की है। काफी बारिश हो रही थी.. हर जगह पानी भरा था। ट्रेन.. टैक्सी.. रिक्शा सब बंद पड़ गए थे। मैं जिस ट्रेन में था.. वो भी बीच रास्ते में ही बंद हो गई थी। सारे यात्री पटरियों से चलकर प्लेटफॉर्म पर आ रहे थे.. मैं भी उनकी तरह प्लेटफॉर्म पर आ गया।

बहुत सारे यात्री बारिश में फंस गए थे। काफी देर तक इन्तजार किया गया.. पर कोई भी ट्रेन चल ही नहीं रही थी इसलिए ज्यादातर यात्री सड़क के रास्ते जाने की सोच कर वहाँ से जा रहे थे।

रोड पर कोई बस या बड़े पहियों वाला ट्रक मिल जाता है.. जो धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहता है। मैंने भी बाइ रोड जाने का सोच लिया.. पर सोचा उससे पहले कुछ खा पी लूँ।

कुछ खाने के लिए मैं जब स्टेशन की कैंटीन की तरफ जा रहा था कि तभी मेरी नजर हमारी एक पड़ोसन सुषमा जी पर पड़ी। सुषमा जी हमारी ही सोसायटी में सामने वाली बिल्डिंग में रहती थीं।

‘हाय.. आप यहाँ?’ मैंने उनके पास जाते हुए कहा।
‘हाँ.. एक सहेली के घर उसकी बर्थ-डे पार्टी में गई थी.. निकलने में देर हो गई और अब यहाँ फंसी पड़ी हूँ.. और आप?’ उसने मुझे पूछा।

‘जी.. मैं कुछ खाने के लिए कैंटीन की तरफ जा रहा था.. अब होटल तो पानी भरने की वजह से खुले नहीं होंगे। पता नहीं.. घर कब पहुँच पाएंगे.. इसलिए सोचा जो मिले वो टाइम पर खा लेते हैं। आप खाएंगी कुछ?’ मैंने उनसे पूछा।

‘चलिए..’ कहकर वो मेरे साथ कैंटीन तक आईं.. हमने नाश्ता मँगाया।

‘आपको क्या लगता है.. ट्रेन कब तक शुरू होंगी?’ उन्होंने नाश्ता करते हुए सवाल किया।
‘मुझे नहीं लगता.. कि सुबह तक शुरू हो पाएंगी.. मैं तो बाइ रोड जाने की सोच रहा हूँ। आप क्या करने वाली हो?’ मैंने उनसे पूछा।

‘मैंने अब तक तो कुछ सोचा नहीं था.. पर अब आप साथ हैं.. तो मैं भी आपके साथ बाइ रोड ही चलूंगी। वैसे भी काफी रात हो चुकी है.. और अकेली रहना ठीक नहीं है। आपके साथ रहूंगी.. तो कम से कम अकेले होने का डर तो नहीं रहेगा।’

‘क्या आपने घर वालों को इंफॉर्म कर दिया है?’ मैंने पूछा।
‘हाँ.. थोड़ी देर पहले फोन किया था। बताया था कि घर नहीं आ पाई तो सहेली के पास वापस चली जाऊँगी.. पर अब बीच में ही फंसी हूँ.. ना इधर की.. ना उधर की..’ हँसते हुए उन्होंने कहा।

फोन की बात से याद आया कि मुझे भी घर फोन करना था। मैंने मोबाईल निकाला तो बैटरी डाउन.. उन्होंने उनका फोन दिया.. पर उनके फोन की रेंज नहीं पकड़ रही थी।

हम दोनों ने नाश्ता किया.. कुछ थोड़ा साथ में भी लिया.. और स्टेशन से बाहर रोड पर आ गए।
जैसे ही हम ब्रिज की सीड़ियाँ उतरे.. हम कमर तक पानी में पहुँच गए थे।

प्लेटफॉर्म पर कम से कम हम सूखे हुए तो थे.. हमारे सर के ऊपर प्लेटफॉर्म की विशाल छत थी.. जो हमें भीगने से बचा रही थी। रोड पर आने से हुआ ये कि ऊपर से मूसलाधार बारिश और नीचे से जमा हुआ पानी हमें भिगो रहा था। हालांकि हमारे पास छाता था.. पर तेज हवाओं से वो बार-बार पल्टी खा रहा था.. जिसकी वजह से हम पूरे के पूरे भीग चुके थे।

बड़ी मुश्किल से हम लोग एक-एक कदम आगे बढ़ा रहे थे। बड़ी गाड़ियों के पास से गुजरने से पानी में तेज छपाके तैयार हो जाते.. जिससे बचने के चक्कर में बैलेंस बिगड़ जाता। दो-तीन बार तो सुषमा जी गिरते-गिरते बचीं। मैंने उनको सहारा देकर पकड़े रखा। हम दोनों अब एक-दूसरे को पकड़े हुए बिल्कुल सट कर चल रहे थे।

करीब-करीब हम दो घंटे चले होंगे कि तभी सुषमा जी अचानक रुक गईं।

‘क्या हुआ?’ मैंने उनसे पूछा।
‘मैं बहुत थक गई हूँ.. थोड़ी देर रुकते हैं। लगता है.. हमें कोई गाड़ी नहीं मिलने वाली.. रात भर यूं ही चलना पड़ेगा। देखिये ना.. आधी रात हो चुकी है..’ वो थककर बोलीं।

‘वो सामने पीली वाली बिल्डिंग दिख रही है?’ मैंने कहा।
‘क्या हुआ उसको?’ उन्होंने थकान में ही कहा।
‘वहाँ पर मैंने फ्लैट लिया हुआ है..’ मैंने कहा।
‘काश.. आप वहाँ रह रहे होते.. कम से कम सुबह तक वहीं रुकते..’ उन्होंने कहा।

‘एक बैचलर लड़का रखा है उसमें.. अभी तक वो रहने नहीं आया.. बस थोड़ा सामान शिफ्ट किया है उसने।’ मैंने जानकारी देते हुए कहा।
‘काश.. वो रहता होता वहाँ पर.. रूम तो खुला मिलता..’ उन्होंने हताशा से कहा।

‘रूम तो अभी भी खुला मिल सकता है..’ मैंने कहा।
‘कैसे?’ उन्होंने हैरानी से पूछा।
‘रूम की एक चाभी मेरे पास है..’ मैंने हँसकर कहा।

‘अरे वाह.. बाल-बाल बच गए.. चलिए जल्दी चलिए।’ उन्होंने जल्दबाजी में कहा।
‘पर आपके घरवाले.. वो तो इंतजार कर रहे होंगे..’ मैंने कहा।

‘इस धीमी रफ़्तार से कौन से हम रातों- रात घर पहुँचने वाले हैं.. सुबह तक आपके फ़्लैट में रहेंगे.. सुबह उठकर निकल जाएंगे।’
‘आपके घर वालों को पता चलेगा तो?’ मैंने फिर चिंता जताई।

‘उनको बताएगा कौन कि रात भर कहाँ थी.. किस के साथ थी? और वैसे भी इस हालत में चलते रहे.. तो हो सकता है मेरी लाश ही घर पहुँचे.. इससे अच्छा है ना.. कि मैं आपके रूम पर रुक कर जिंदा घर पहुँचूँ..’ उन्होंने सवालिया जबाव दिया।

मैं उनकी बात पर मुस्कुराया और उनको साथ लेकर बिल्डिंग की तरफ जा ही रहा था कि तभी जोर से बिजली कड़की। वो जोर से चिल्ला कर मुझसे लिपट गईं.. ठीक उसी वक़्त उस एरिया की लाइट भी चली गई।

‘ओ माय गॉड.. अब इस लाइट को क्या हुआ?’ वो गुस्से से बोलीं।

‘बिजली वालों ने बिजली काट दी होगी। अक्सर ऐसी बारिश में शॉक सर्किट होने का खतरा रहता है.. इसलिए बिजली काटनी पड़ती है।’
‘क्या करती मैं अकेली.. अगर आप नहीं होते तो?’ वो झुंझला कर बोलीं।

हम रास्तों के गड्डों से बचते-बचाते आगे चल रहे थे.. जैसे-जैसे हम बिल्डिंग के पास पहुँच रहे थे.. हम पानी में और अन्दर घुसे जा रहे थे।
‘ओ माय गॉड.. यहाँ तो बहुत पानी भरा है।’ उन्होंने डर के मारे कहा।
‘हाँ.. ये निचला इलाका है.. यहाँ अक्सर ज्यादा पानी भरता है।’
‘मुझे पकड़े रहना.. नहीं तो मैं डूबकर मर जाऊंगी।’ उन्होंने ने मुझसे सटकर मेरे कंधे पर अपना हाथ डाला।

पानी अब हमारे सीने तक लग रहा था, वो डर के मारे मुझसे और ज्यादा चिपक गई थीं, मैंने उनकी कमर में हाथ डालकर उन्हें जोर से थामा हुआ था।

हम इस अवस्था में चल ही रहे थे कि तभी वो फिर लड़खड़ाईं, मैंने झट से उन्हें पकड़ लिया.. वर्ना वो सड़क के गंदे पानी में गिर जातीं.. पर उन्हें बचाने के चक्कर में मैंने उनकी कमर के साथ-साथ उनके सीने का भी सहारा लिया था।
दरसल गलती से मेरे हाथ में उनके मम्मे आ गए थे।

‘ऐसे ही पकड़े रहो प्लीज..’ कहती हुई वो डर-डर कर आगे बढ़ रही थीं।
मैं भी उनकी इजाजत के बाद वैसे ही कमर और मम्मों को पकड़ कर जैसे-तैसे बिल्डिंग तक लाया।

फ्लैट पहले माले पर ही था.. हम दरवाजा खोल कर अन्दर चले गए।

कमरे में एक लॉक की हुई अलमारी.. एक टेबल.. एक चेयर.. एक स्पंज की गादी.. दो छोटी बेडशीट और एक ओढ़ने वाली चादर.. इतना ही सामान था।

मोबाइल की रोशनी में हमने देखा कि हमारे कपड़े रोड के गंदे पानी से बुरी तरह से मैले हो गए थे।

‘एक काम करते हैं हम.. पानी होगा तो नहा लेते हैं.. और यह कपड़े भी धोकर सुखा लेते हैं.. सुबह तक थोड़े तो सूख ही जाएंगे..’ सुषमा जी ने प्रस्ताव रखा।
‘पर कपड़े धोएंगे.. तो पहनेंगे क्या?’ मैंने पूछा।
‘ये बेडशीट्स लपेट लेंगे.. रात भर बिना कपड़ों के रहेंगे.. तो कल तक बीमार पड़ जाएंगे।’

ये कहती हुई वो बेडशीट लेकर बाथरूम में चली गईं।

हुड.. हुड.. हुड..! थोड़ी देर बाद वो ठंड से कांपती हुई बाहर आईं।

‘क्या हुआ?’ उनकी अवस्था को देखकर मैंने पूछा।
‘पानी बहुत ठंडा है.. बहुत ठंड लग रही है..’ कहकर वो अपने कपड़े फर्श पर सुखाने के लिए फ़ैलाने लगीं।

मैं भी जब कपड़े धोकर और नहा कर बाहर आया तो ठंड से कांप रहा था।

‘आपको भी ठंड लग रही है ना?’ उन्होंने हँसते हुए पूछा।
‘हाँ.. पर आप तो अभी भी कांप रही हो?’ मैंने कहा।
‘हाँ.. बदन पोंछने से बेडशीट भी गीली हो गई है.. जिससे और ज्यादा ठंड लग रही है..’ उन्होंने कहा।

‘आप एक काम कीजिए ना.. बेडशीट निकाल कर वो चादर लपेट लीजिए..’ मैंने उनको सुझाव दिया।
‘इससे मेरा काम तो बन जाएगा.. पर आप क्या करोगे?’ उन्होंने मुझसे पूछा।

‘अब चादर तो एक ही है न?’ मैंने हल्की आवाज में कहा।
‘एक काम कीजिए.. मोबाइल की लाइट बंद कर दीजिए और आप भी गीली बेडशीट उतार दीजिए।’

मैंने बिना बहस किए मोबाईल की लाइट बंद कर दी, वो अपनी बेडशीट निकालकर चादर में घुस गईं।

‘सुनिए.. आप नंगे बदन फर्श पर मत बैठिए.. यहाँ ऊपर आ जाइए.. और हो सके तो थोड़ी चादर ओढ़ लीजिए..’ उन्होंने लेटते हुए कहा।

मैं उनके सर के पास जाकर पैर चादर में डालकर बैठ गया।

‘आप सो जाओ.. आप भी थके हुए हैं।’ उन्होंने कहा।
‘नहीं.. थोड़ी देर बैठता हूँ..’ मैंने शराफत दिखाते हुए कहा।

हम उसी अवस्था में एक-दूसरे से बातें कर रहे थे कि तभी एक बार बिजली इतनी जोर से कड़की कि वो फिर डर कर मुझसे लिपट गईं.. पर इस बार चूंकि वो लेटी हुई थीं और मैं उनके सर के पास बैठा हुआ था। उनके लिपटने से उनका मुँह मेरे तने हुए लंड पर आ गया।

‘ओ माय गॉड..!’ उनके मुँह से निकला.. और वो दूर हो गई।
कुछ देर ख़ामोशी छाई रही.. फिर मैंने ही उन्हें पुकारा- आप ठीक तो हैं ना?

‘हाँ.. आज क्या-क्या हो रहा है हमारे साथ?’ कहकर वो हँसने लगीं।
मैं भी हँसा।
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‘अब आप भी सो जाइए.. वर्ना फिर बिजली कड़केगी और फिर वही होगा।’ ये कहकर वो फिर खिलखिलाईं।
मैं उनकी बगल में सो गया.. मेरे अन्दर और शायद उनके भी अन्दर वासना जागृत हो गई थी।

फिर एक जोरदार बिजली कड़की और उसके कड़कते ही सुषमा जी मुझसे लिपट गईं। दो नंगे बदन एक-दूसरे से सट गए। अब वो जो लिपट गई थीं.. तो वो दूर होना नहीं चाह रही थीं।
मैंने भी उन्हें अपने आगोश में ले लिया। उन्होंने मेरे सीने पर अपना सर रखा और उसे चूम लिया। मैंने भी बदले में उनके माथे को चूम लिया।
अब कहने के लिए कुछ बचा नहीं था।

मैंने एक हाथ से उनके मम्मों को दबाना शुरू किया।
वो भी मेरी जाँघों पर अपनी जाँघें रगड़ कर मेरा साथ देने लगीं।

मैं आहिस्ते-आहिस्ते उनके मम्मों को मसल रहा था। वो भी मेरे बदन पर किस किए जा रही थीं। कुछ देर उनके बदन से खेलकर मैंने उन्हें मेरे नीचे ले लिया और खुद उन पर सवार हो गया।

वो समझ गईं कि मैं उन्हें पेलने के लिए तैयार हो गया हूँ.. उन्होंने भी अपनी टाँगें फैलाकर मुझे चोदने का निमंत्रण दे दिया।

मैंने भी उनके निमंत्रण को स्वीकार करते हुए अपना लंड उनकी चूत में डालकर उसे अन्दर घुसेड़ना शुरू कर दिया, हल्के से दबाव के साथ ही लंड पूरा का पूरा चूत की जड़ तक जा कर फिट हो गया।

मैंने फिर उसे बाहर निकाला और फिर अन्दर डाल दिया, यूं ही अन्दर-बाहर करते हुए मैं उनकी चूत में ही झड़ गया।
सारी रात हम चुदाई करते रहे। सुबह जल्दी उठकर अलग-अलग हो कर अपने-अपने घर को चले गए।

आज भी किसी को यह बात पता नहीं कि हम दोनों किसी बरसात में इकट्ठे फँसे थे और उस रात चुदाई के मजे लूटे थे।

कहानी के बारे में आपके जो भी अच्छे सुझाव हों.. आप मुझे मेल कर दीजिए।
फालतू मेल में आपका और मेरा कीमती वक्त जाया मत होने दीजिए।

मेल करते वक्त कहानी का टाइटल क्या है.. और आपको उसका कौन सा हिस्सा पसंद आया.. ये बता देंगे.. तो मेल का जबाव देना आसान हो जाएगा।
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