वेश्या पतिता नहीं होती

फ़ुलवा 2014-06-25 Comments

वेश्या पतिता नहीं होती, पतन को रोकती है
पतित जन की गन्दगी, अपने हृदय में सोखती है
जो विषैलापन लिए हैं घूमते नरपशु जगत में
उसे वातावरण में वह फैलने से रोकती है…

यही तो गंगा रही कर, पापियों के पाप धोती
वह सहस्रों वर्ष से बस बह रही है कलुष ढोती
शास्त्र कहते हैं कि गंगा मोक्षप्रद है, पावनी है
किसलिए फिर और कैसे वेश्या ही पतित होती?

मानता हूँ वेश्या निज तन गमन का मूल्य लेती
किन्तु सोचो कौन सा व्यापार उनका कौन खेती?
और यह भी कौन सी उनकी भला मजबूरियाँ हैं
विवश यदि होती न, तो तन बेचती क्यों दंश लेती?

मानता यह भी कि वेश्यावृत्ति पापाचार है यह
किन्तु रोटी है यह उनकी, पेट हित व्यापार है यह
देह सुख लेते जो उनसे, वही उनको कोसते भी
और फिर दुत्कार सामाजिक भी, अत्याचार है यह…

गौर से देखो, बनाते कौन उनको वेश्याएँ
और वे हैं कौन, जो इस वृत्ति को खुद पोषते?
पतित तो वे हैं जो रातों के अंधेरों में वहाँ जा
देह सुख भी भोगते हैं, और फिर खुद कोसते हैं…

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