पापा के बड़े भाई यानि ताउजी की चुदासी बिटिया

(Papa Ke Bade Bhai Ki Chudasi Bitiya)

नमस्कार दोस्तो, मेरा नाम राघव है और मैं आज अपने जीवन की सच्ची कथा आप सभी के सामने पेश कर रहा हूँ। मैं एक बड़ी ही सामान्य कद-काठी का परंतु ऊर्जावान मनुष्य हूँ। इस सच्ची कथा में मैं आप सभी को मेरी और मेरे ताऊ की लड़की के बीच हुए सेक्स के बारे में बताऊंगा। मेरे ताऊ की लड़की का नाम निहारिका (बदला हुआ) था।
उसकी लंबाई सामान्य लड़कियों से कुछ अधिक थी।

बूब्स का आकार ऐसा था मानो वो तीन बच्चों की माँ हो। कहने का अर्थ है कि उसके चूचे बहुत ही ज्यादा बड़े थे. उसकी गांड का तो कहना ही क्या! इतनी सम्मोहित करने वाली गांड थी कि अगर कोई छक्का भी देख ले तो उसका भी औजार तनकर नब्बे डिग्री के एंगल पर खड़ा हो जाये।
दिखने में भले ही वो कटरीना कैफ न हो परंतु सेक्सी इतनी थी कि उसे देखते ही उसकी गांड में अपना लंड डालने का मन हो उठे। वैसे मेरा और निहारिका के बीच सेक्स बहुत छोटी ही उम्र से चलता आ रहा था। मगर यह शरीर तक नहीं पहुंचा था.

अभी तक वह नजरों से ही मेरे बदन की प्यासी दिखाई पड़ती थी. चूंकि मैं उससे काफी छोटा था और वह मुझसे उम्र में सात साल बड़ी थी, वह बचपन से ही मुझ पर नजर रखे हुए थी. उस वक्त तो मैं छोटा था और इन सब बातों के बारे में ज्यादा कुछ जानता नहीं था.
मगर जब मैं 18 साल को पार कर गया तो मुझे बचपन की वो सारी बातें समझ में आने लगीं कि वह मुझसे क्या चाहती थी. मगर जवानी से पहले उसने कभी मेरे साथ कुछ गलत हरकत करने की कोशिश नहीं की थी. वह भी शायद मेरे जवान होने का इंतजार कर रही थी. जवान हुआ तो उसने अपना हवस भरा खेल मेरे साथ शुरू कर दिया. वो मुझे अपने साथ बैठाकर कभी मेरे लंड को अपने मुँह में लेकर चूसती तो कभी मेरे मुँह को चूमती।

कभी दीदी अपने बूब्स को चुसवाती तो कभी अपनी चूत को मेरी उंगलियों से सहलाती। बिल्कुल सत्य कहूँ तो मित्रों मुझे बड़ा आनंद मिलता था इस सब क्रियाओं में उसके साथ। एक रात जब घर में कोई न था तब उसने अचानक मुझे अपने आगोश में ले लिया और मुझे उठाकर एक अंधेरी सी जगह पर ले गयी। मैं डरने का झूठा नाटक कर रहा था परंतु अंदर ही अंदर मैं बहुत प्रसन्न था। अंधेरे में ले जाकर उसने अचानक कुछ ऐसा किया जो उसने पहले कभी नहीं किया था।

पहले तो उसने मेरा लंड अपने हाथों से पकड़ा और जोर-जोर से हिलाने लगी फिर दीदी ने मेरा लंड अपने मुँह से छुआ। जिससे मेरे अंदर सरसरी सी दौड़ गयी। ऐसा अहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था। मेरा लंड तन कर तकरीबन 6 इंच का हो गया। मेरे लंड को तना हुआ देखकर वो बहुत खुश हो गयी। फिर उसने जो किया मैं शायद कभी अपनी ज़िंदगी में न भूल पाऊंगा।

उसने अपनी गांड मेरी ओर की और मुझसे कहा- इसके अंदर अपना लंड डाल!
मैं थोड़ी देर तो सकपकाया सा रह गया। फिर उसने थोड़ा और जोर दिया तो मैंने अपने लंड को उसकी गांड में घुसाने का प्रयत्न करना शुरू कर दिया। पहले तो मुझे थोड़ी मुश्किल हुई पर उसके द्वारा मेरे लंड को चूसे जाने से मेरा लंड काफी चिकना हो गया और सीधा दीदी की गांड में 3 इंच अंदर तक पूरा चला गया। उसकी जोर से चीख निकली पर फिर उसने अपनी आवाज़ दबा ली।

मैं बाकी के लेखकों की तरह झूठ नहीं बोलूंगा. उस उम्र में तजुर्बा ना होने की वजह से मेरा लंड घुसते ही सम्पूर्णतः आनंदमय होकर पुनः छोटा हो गया। आप समझ सकते हैं कि पहली बार नारी के बदन का भेदन करने पर भला कौन होगा जो खुद पर इतना कंट्रोल रख पाए. इसलिए मैं तो 2 मिनट भी नहीं टिक सका. मगर निहारिका का मन अभी नहीं भरा था वो अपनी गांड को बहुत जोर-जोर से पीछे करके मेरे लंड को अंदर लेने लगी।
इतनी जोर से कि मुझे शीघ्र ही दर्द होने लगा।

थोड़ी देर बाद वो रुकी और दीदी ने मेरे लंड को पुनः चूसा और मुझे गाल पर किस देकर मुझे मेरे घर छोड़ आयी। उस दिन मुझे जो अनुभव मिला वो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। मेरे मन में आया कि अब मुझे निहारिका से दूर रहना चाहिए और पढ़ाई पर ध्यान लगाना चाहिए इसलिए मैंने तब से लेकर दो साल बाद तक उससे दूरी बनाये रखी।

किंतु जब मैं कॉलेज में पहुंचा तो मेरे अंदर सेक्स के प्रति अनुराग फिर से जाग गया। मुझे फिर से निहारिका की याद आयी। अब मेरा मन किया कि क्यों न अब मुझे अपनी जवानी में उसे थोड़ा दर्द देने का मौका मिले? मैंने यह निश्चित किया कि अब मैं उससे अधिक से अधिक बात करने का प्रयत्न करूंगा. साथ ही साथ उसे सम्मोहित करने की भी कोशिश करूंगा। मैं कोई न कोई बहाना लेकर उसके पास जाने लगा।

वो भी ऐसा नाटक करने लगी थी जैसे इससे पहले हमारे बीच में कुछ हुआ ही न हो। बड़े ही सामान्य तरीके से मुझसे बातें करने लगी थी वो। पर मुझे उसकी आँखों में दिखता था कि वो अभी भी कुछ नहीं भूली और उसके अंदर संभोग करने की कितनी प्यास थी। मैं भी उसके साथ थोड़े बहुत मज़े लेने लगा। जैसे कभी उसकी गांड को छूकर अचानक से गुजर जाना, कभी उसके बूब्स को अचानक अकस्मात छू लेना इत्यादि। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा.

फिर आया दिसंबर … उस साल सर्दियां थोड़ी कम पड़ रही थीं। एक रात को मैंने उसे उसकी छत पर टहलते- टहलते हमारे चाचा की लड़की के साथ अंताक्षरी खेलते हुए पाया।
मेरे अंदर से आवाज़ आयी कि आज तेरा दिन है कि तू भी कुछ करके दिखा। संयोग से उस दिन बिजली भी पूरे जिले में ही नहीं थी। ऐसा बढ़िया मौका शायद ही दोबारा मिलता। मैं भी उसकी छत पर अंताक्षरी खेलने के बहाने चला आया। मेरी अच्छी छवि के कारण उन्होंने शीघ्र ही मुझे भी उनके साथ खेलने की स्वीकृति दे दी। हम तीनों छत पर टहलते-टहलते खेलने लगे।
वो बीच में थी और मैं और उसकी चचेरी बहन दायीं और बायीं ओर थे।

अंधेरा बहुत अधिक था इसलिये कोई भी एक दूसरे को आसानी से नहीं देख सकता था। मुझे बहुत अच्छा मौका मिल गया। मैं धीरे-धीरे उसके बूब्स और गांड पर हाथ फेरने लगा। शायद उसे भी आनंद आ रहा था इसलिए उसने कुछ नहीं कहा. वरना चाहती तो वो अपनी चचेरी बहन से कहकर बहुत बड़ा हंगामा खड़ा करवा सकती थी।

मुझे भी अब ग्रीन सिग्नल मिल गया था. मैं भी अब जोर-जोर से रगड़ने लगा। फिर कुछ समय बाद अचानक निहारिका के बाकी भाई बहन भी ऊपर छत पर आ गए और मेरा प्लान बर्बाद होता दिखने लगा. परंतु मैं उस दिन हार मानने के मूड में नहीं था। अब हम सभी लोग फिर से अंताक्षरी खेलने लगे। मैं निहारिका और एक दो और लोग, हम सब एक टीम में और बाकी सब दूसरी टीम में अंताक्षरी खेलने लगे। मैं और मेरी टीम के बाकी सदस्य निहारिका के पीछे जाकर खड़े हो गए। मैं उसके बिल्कुल पीछे जाकर खड़ा हो गया।
अंधेरा अभी भी बहुत अधिक था।

कोई भी एक दूसरे को अच्छे से नहीं देख पा रहा था। मेरा लंड अब बिल्कुल खड़ा हो चुका था। मेरे लंड की लंबाई भी तकरीबन सात इंच के लगभग हो गयी थी। तब मुझे एक तरकीब सूझी कि क्यों न लंड को पैंट के अंदर ही रख कर थोड़े मज़े लिए जाएं? मैं पैंट के अंदर से ही उसे अपने लंड से धक्के देने लगा।
पहले तो उसे थोड़ा अजीब लगा परंतु बाद में वो सामान्य होकर धक्के सहन करने लगी। ऐसा ही तकरीबन 15 मिनट तक चला और मैं झड़ गया। मेरी जवानी का वीर्य मेरी पैंट के अंदर ही रह गया और किसी को बिल्कुल भी खबर नहीं हुई। किंतु दो साल पहले हवस का जो भूत निहारिका के दिमाग पर सवार था वही भूत आज मेरे दिमाग में भरा हुआ था.

अभी मैं संतुष्ट नहीं हुआ था. थोड़ी ही देर में मेरा औजार फिर से खड़ा हो गया। अब अंताक्षरी खेलते-खेलते भी बहुत समय हो गया था. सभी लोग जाने लगे। अब सभी लोग छत से जा चुके थे और मैं, निहारिका और उसके दो भाई-बहन छत पर थे। हम लोग वैसे ही कुछ देर तक बात करने लगे. मैं भी निहारिका को उसके बदन पर कभी यहाँ तो कभी वहाँ छू-छूकर गर्म करने की कोशिश करने लगा। वो अब बहुत गर्म हो चुकी थी.
उसकी साँसों से मैं बता सकता था कि वो बहुत ही ज्यादा गर्म हो चुकी है।

थोड़ी ही देर में वो नीचे जाने के लिए उठी। मैं भी उसको उठता देखकर उसके पीछे जाने लगा। अभी भी बिजली नहीं आयी थी और नीचे जाने वाली सीढ़ियों पर बहुत अंधेरा था। वह सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी. मैं भी उससे एक-एक सीढ़ी पीछे उतरने लगा। अंतिम सीढ़ी पर जाकर वो रुकी और मेरी ओर मुड़ गयी। मेरा दिल जोर से धड़कने लगा।
निचली सीढ़ियों पर खड़े हुए मेरा दिल धक-धक कर रहा था.

घबराहट पकड़े जाने की नहीं बल्कि हवस को पूरा करने की थी. हवस जब नई-नई जागना शुरू होती है इस तरह की घबराहट अक्सर महसूस होती है जैसी मुझे उस वक्त हो रही थी.
निहारिका नीचे वाली सीढ़ी पर खड़ी हुई थी और मैं इस इंतजार में था कि अब अगले पल में क्या होने वाला है. दो पल तक उसका इंतजार करने के बाद मैं उसको पीछे से पकड़ने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाने ही वाला था कि निहारिका ने मेरी पैंट के ऊपर से मेरे लंड को सहलाना शुरू कर दिया.

मेरा काम बन गया था. जो आग मेरे अंदर जल रही थी उसी आग में निहारिका भी तप रही थी. उसने मेरे लंड को खड़ा होने के बाद अपने हाथों में भरने की कोशिश की मगर पैंट बीच में आ रही थी. वह मेरे लंड को पकड़ कर उसकी पूरी फील लेने का मजा ले रही थी. उसके हाथ में जाकर मेरा लंड भी आनंद में गोते लगाने लगा था.
इससे पहले भी दीदी ने मेरे लंड को अपने हाथ में लिया था मगर आज की बात ही कुछ निराली थी. एक तो सीढ़ियों पर अंधेरा था. ऐसे में सेक्स का खुमार घरवालों के डर पर हावी हो जाता है. हम दोनों भी बिना किसी की परवाह किये एक दूसरे में खो जाने को बेताब थे.

मैंने निहारिका की चूचियों को पकड़ कर उनको जोर से दबाना शुरू कर दिया. वह नीचे से मेरे लंड को अपने हाथ में लेकर बार-बार दबाकर उसको नाप रही थी. मेरा लंड फटने वाला था. जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैंने अपना हाथ अपनी चेन की तरफ बढ़ाया मगर निहारिका ने इससे पहले ही मेरे हाथ को रोक लिया.

निहारिका मेरे चूतड़ों को अपने दोनों से पकड़ लिया. वह थोड़ी नीचे की तरफ झुकी और उसने मेरी पैंट में तने हुए मेरे लंड पर अपने होंठों को रगड़ना शुरू कर दिया. आनंद के मारे मेरी आंखें बंद हो गईं. मैंने उसके सिर को पकड़ कर उसके होंठों को अच्छे तरीके से अपने लंड पर रगड़वाना चालू कर दिया.
मम्मी कसम … वह पल जब याद करता हूँ तो आज भी लंड सलामी देने लगता है. निहारिका मेरे लंड को बार-बार पैंट के ऊपर से ही चूम रही थी. वह मुझमें पूरा जोश भर देना चाहती थी. मैंने उसकी चूचियों के अंदर हाथ डाल दिया था और उनको जोर-जोर से भींचना शुरू कर दिया था.

हम दोनों को यह भी ध्यान नहीं रहा कि हम सीढ़ियों में खड़े होकर यह सब कर रहे हैं. सारा होश हवस के नशे रफू चक्कर हो गया था. मेरा मन तो कर रहा था कि अभी लंड बस निहारिका के मुंह में चला जाए. मगर पता नहीं वह मुझे क्यों तड़पाने में लगी हुई थी.
कुछ देर तक मेरे लंड को अपने होंठों से सहलाने के बाद निहारिका ने आगे कदम बढ़ाया.

अचानक से उसने मेरी पैंट को खोला और मेरे अंडरवियर में से मेरा लंड निकाल कर अपने हाथ से हिलाने लगी। फिर अचानक से उसने मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया। उसकी छुअन बहुत ही सुंदर प्रतीत हुई और मुझे अपार आनंद देने लगी। उसने मेरे लंड को मुंह में लेकर वहीं पर चूसना शुरू कर दिया.
मुझे इतना आनंद आ रहा था कि मैंने अपने चूतड़ों को आगे की तरफ धकेलते हुए उसके मुंह को चोदना शुरू कर दिया था, ऐसा लगा कि मैं सीधा झड़ ही जाऊंगा। दीदी मेरे लंड को मुंह में लेकर इतने प्यार से चूस रही थी जैसे उसके होंठ लंड को प्यार देने के लिए बनाए हैं ईश्वर ने. मेरी हालत वहीं पर खराब होना शुरू हो गई थी. स्थिति मेरे नियंत्रण के बाहर होती जा रही थी. मन कर रहा था अभी उसको दीवार के सहारे लगाकर बुरी तरह से चोद दूँ. मगर सीढ़ियों पर चुदाई करने में काफी रिस्क था.

मेरी पैंट सरकते हुए नीचे मेरे टखनों में जाकर बैठ गई थी. मेरा अंडरवियर मेरे घुटनों तक पहुंच चुका था. निहारिका कभी मेरे लंड को चूसने लगती तो कभी उसको हाथ में लेकर मुट्ठ मारने लगती. उफ्फ … मैं तो बेकाबू हो रहा था उसकी हरकतों के कारण. फिर उसके बाद उसने जो किया वह तो आनंद की परम सीमा थी. उसने मेरी गांड को अच्छे तरीके से अपने हाथों में पकड़ लिया. उसके दोनों हाथ मेरे एक-एक चूतड़ पर पीछे की तरफ आकर सेट हो गये थे. उसकी उंगलियां मेरी गांड की दरार तक पहुंच गई थीं.

निहारिका ने मेरी गांड पर अपनी उंगलियों की पकड़ को टाइट किया और मेरे खड़े लंड के टोपे को ऊपर से चूसते मेरे पूरे डंडे पर अपनी जीभ को फिराते हुए नीचे तक अपनी जीभ से मेरे लंड को गीला करने लगी. उसके बाद उसने अगले ही पल मेरे अंडकोषों को अपने होंठों में भर लिया और उसकी नाक मेरे लंड की जड़ में आकर धंस गई. वह अपनी जीभ से मेरे अंडकोषों को मुंह के अंदर ही पपोलने लगी.

उसकी इस हरकत ने मेरे सब्र की सारी सीमाओं को पार कर दिया. बस अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता था. मैंने तुरंत उसके अपने लंड के नीचे से हटा दिया. अगर दो-तीन सेकेण्ड भी वह ऐसा और कर देती तो मेरा वीर्य उसके सिर के बालों को नहला देता.

मैंने उसको अपने हाथों से पीछे हटा दिया और अपने अंडरवियर को ऊपर कर लिया. मैंने लंड को ढक लिया और फिर पैंट को भी ऊपर कर लिया. धीरे से निहारिका के कान के पास अपने होंठों को ले गया और मैंने उससे पलंग पर चलने को कहा.
उसने कहा- वहां घरवालों के आने का डर है।
अचानक से फिर से निहारिका ने मेरी पैंट को खोल दिया और जोर-जोर से मेरा लंड चूसने लगी।

मुझे तो स्वर्ग की अनुभूति सी होने लगी। मुझे लगा कि मैं झड़ने वाला हूँ. यह नहीं रुकने वाली आज. फिर वो अचानक रुकी और खड़ी हो गयी।
मैंने थोड़ी देर उसकी कुर्ती में से उसके तने हुए बूब्स को दबाया फिर मैं उसके बूब्स को बाहर निकालकर चूसने लगा। मुझे बहुत ज्यादा मज़ा आ रहा था। आज भी मुझे उस घटना का एक-एक पल याद है। फिर दीदी ने अपनी पैंटी को उतारा और मुझसे अपना लंड उसकी चूत में घुसाने को कहा।

मैंने अचानक से घुसाया तो उसे बहुत जोर का दर्द हुआ. वो थोड़ा सा चीख पड़ी. फिर मैं धीरे-धीरे उसे किस करते-करते धक्के लगाने लगा। उसे भी मज़ा आने लगा. वो भी खड़े-खड़े ही अपने आप को आगे की ओर करने लगी। थोड़ी देर बाद मैं उसके अंदर ही झड़ गया।

पहली बार उसकी चूत में मेरा वीर्य जब झड़ा तो उसका आनंद कभी नहीं भूल सकता मैं. मैंने उसको किस करके बाय कहा और मैं अपने घर वापस आ गया।

अब उसकी एक दुबले से व्यक्ति से शादी हो चुकी है. मैंने उसके पति को देखा है. उसकी सेहत देख कर तो लगता है कि वह उसको शायद ही खुश कर पाता होगा. काम वासना की जितनी आग निहारिका के अंदर मैंने देखी है उसके लिए तो उसको एक रति-क्रिया में माहिर मर्द चाहिए जो उसकी योनि की अग्नि में अपने वीर्य की बरसात कर सके.

मैं अभी भी निहारिका की तरफ आकर्षित होता रहता हूँ. मुझे अभी भी लगता है कि वो भी मेरे साथ किये गए सेक्स के बारे में रोज़ सोचती होगी। अभी भी जब वो मायके वापस आती है तो मैं उसे चोदने की कोशिश में लगा रहता हूँ पर अभी तक सही मौका नहीं बन पाया है।

मैं पूरी कोशिश में हूँ कि जैसे ही निहारिका दीदी के साथ चुदाई का सीन बनेगा मैं आप सबको जरूर बताऊंगा. शादी के बाद लड़कियों की सोच और शरीर में काफी परिवर्तन हो जाता है. मैं यह देखने के लिए हमेशा उतावला रहता हूँ कि निहारिका की सोच में कुछ परिवर्तन आया या नहीं. साथ ही साथ मुझे इस बात की भी जिज्ञासा है कि निहारिका के शरीर में क्या-क्या बदलाव आए हैं. यह सब तो तभी पता लग पाएगा जब उसको फिर से चोदने का मौका मिलेगा और मैं आज तक उसी मौके की तलाश में हूँ.

मेरी यह सच्ची कहानी आपको कैसी लगी, मेल के द्वारा मुझे जरूर बताइयेगा. निहारिका के साथ हुई नई घटनाओं की जानकारी मैं आपको समय-समय पर देता रहूंगा.
[email protected]

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