नया मेहमान-5

(Naya Mehman-5)

This story is part of a series:

‘भाभी, एक आखिरी बात कहना चाहता हूँ, उम्मीद है कि आप मना नहीं करोगी।

बोली- क्या?

मैंने कहा- गुस्सा ना होना, मना मत करना, तभी बताऊँगा।

बोली- गुस्सा नहीं होऊँगी, कहो!

मैंने कहा- एक बार तुम्हें दिलाये सेट को पहने हुए तुम्हें देखना चाहता हूँ!

बोली- यह तो आप बेशर्मी कर रहे हो!

मैंने कहा- क्यों?

तो बोली- किसी पराई स्त्री के लिए तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?

मैंने कहा- भाभी, पहले तो आप पराई नहीं मेरी सलहज हो, फिर मैं आपको जिस रूप में देख चुका, उससे तो यह रूप काफी अच्छा होगा। मैं देखना चाहता कि तुम्हारे नायाब, उन्नत ठोस भरे हुए और विशाल स्तनों पर यह ब्रा कितनी सुन्दर लगती है।

अब वो चुप हो गई और अपनी तारीफ सुन वासना से परिपूर्ण होती जा रही थी।

मैंने कहा- प्लीज भाभी ! कंधे पर हाथ रखकर कंधे को दबा दिया फिर अपने हाथ से उसका पल्लू खींच दिया।

बोली- ठीक है इसके आगे परेशन नहीं करोगे।

उसने मेरी तरफ पीठ करके ब्लाउज़ के हुक खोल लिए, फिर शरमाते हुए बोली- लो जल्दी देखो !

एक झलक दिखाकर फिर हुक बंद करने लगी, मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा- ऐसे नहीं ! पूरा ब्लाउज़ उतारकर दिखा दो ना !

फिर बड़े मनुहार के बाद भाभी ने ब्लाउज़ उतारा।

‘वाकई भाभी, आप पर यह ब्रा कितनी खूबसूरत लग रही है, फ़िल्मी हीरोइन भी फेल है आपके आगे !’ मैंने कहा- अब इस सेट का दूसरा भाग और दिखा दो।

बोली- क्या मतलब?

मैंने कहा- आपसे पहले ही कहा था कि आपको सेट पहने हुए देखना चाहता हूँ।

तो रेखा बोली- नहीं ! अब मैं इससे आगे कुछ नहीं दिखा सकती ! प्लीज़ जीजाजी, मुझे अब काम कर लेने दो, आप जाओ यहाँ से।

मैंने कहा- भाभी मुझे पेंटी देखना है, आपके पुष्ट, मांसल, उभरे हुए कूल्हों पर और चिकनी कमर पर कैसी लगती है, उसके अन्दर का नहीं देखना, वो तो मुझे आप पहले ही दिखा चुकी हो बाथरूम में नहाते हुए।

अब तक वासना उस पर हावी हो चुकी थी, कामदेव के बाण से वो छलनी हो चुकी थी, आँखों में नशा सा छा गया था।

तभी तो मेरे हर अनुचित आदेशों का पालन यंत्रवत करती जा रही थी, वो साड़ी और साया को ऊपर उठाने लगी तो मैंने हाथ पकड़ लिया- ऐसे नहीं ! इन्हें पूरा उतारकर दिखाओ ना। बस फिर आगे कुछ नहीं उतारवाऊँगा।

मेरी बात सुनकर वो मूर्तिवत सी हो गई थी, फिर मैंने ही उसकी साड़ी खींच कर निकाल दी, साया और ब्रा का संयोजन बहुत ही उत्तेजक था, पर हमें तो और आगे जाना था, अब मैंने साया का बंद नाड़ा अपने हाथ से खोल दिया।

जैसे ही साया जमीन पर गिरा उसकी चेतना सी लौट आई, रेखा साया पकड़ने को नीचे झुकी तो उसके मम्मे अन्दर तक दिखाई दिए, नितम्ब उभर कर जो दिखाई दिए तो मेरे को समझ आया कि इसलिए इन्हें गांड जैसे शब्द से नवाजा है। वाकई इनके सुन्दर न होने से सुन्दरता अधूरी है।

मैंने कहा- भाभी, जरा रुको तो ! मुझे जी भरके देख तो लेने दो !

फिर उसका हाथ पकड़कर खींच कर आईने के सामने ले गया, कहा- भाभी, आज अपने आप को आईने में देख कर महसूस करो अपनी सुन्दरता को !

आइने में अपना प्रतिबिम्ब देख रेखा ने लजा कर सर झुका लिया, मैं उसके ठीक पीछे खड़ा था, मैंने कहा- भाभी, देखो कितनी रूपवती लग रही हो ! तुम्हारे यौवन की महक मुझे भी मदहोश कर रही है !

जब उसने चेहरा उठा कर आईने में देखा तो मैंने अपने गर्म होंठ उसकी पीठ और सर के बीच गर्दन पर रख दिए इस दृश्य को उसने आईने में देखा तो उसकी आँखे स्वतः बन्द होने लगी।
फिर अपने होंठ को बिना हटाये कंधे तक लाया, साथ ही आईने में मैं रेखा की प्रतिक्रिया भी देख रहा था। वो आँखों को अब भी बंद किये हुए थी, पर सांसों की गति बढ़ गई थी।
फिर होंठों को फिराते चूमते पीठ से कमर तक गया, कमर से घूम कर उसके सामने नाभि तक आया होंठ को उसके शरीर से दूर नहीं किया नाभि से पेट पर आ ही रहा था रेखा के हाथ ने मेरे सिर को थाम लिया, जैसे चाह रही हो कि इसके आगे मत जाओ !

लेकिन मैंने भी इस बीच अपने दोनों हाथ रेखा भाभी के कूल्हों पर दोनों ओर रख लिए फिर गांड पर हाथ फिराते हुए, पेट को चूमते हुए मेरे होंठ दोनों स्तनों के बीच की घाटी तक पहुँच गये जहाँ अपनी जीभ से घाटी को सहलायाम चूस कर गीला कर दिया।

रेखा को सिसकी आने लगी थी।

अब मेरे हाथ उसकी पीठ को सहला रहे थे फिर मेरे होंठ उसकी छाती, कंधे से गर्दन,गर्दन से गाल तक पहुँच गए।

रेखा भाभी का शरीर कांप रहा था, अंतिम पड़ाव उसके होंथों पर मेरे होंठ जाकर रुके तो रेखा भाभी अपने आप को छुड़ाने का प्रयास करने लगी परन्तु पीठ को कसकर पकरे हुए मैंने अपने होंठों से उसके होंठों को दबा लिया, फिर जीभ उसके होंठों के अन्दर डाल दी।

भाभी निढाल सी होकर मेरी बाँहों में झूल गई। मेरी जरा भी चूक होती तो वो जमीन पर गिर जाती।

अब मेरे सारे रास्ते खुल गए, किला भी फतह हो गया था बस झंडा गाड़ना बाकी रह गया था।

भाभी को गोद में उठाकर पलंग पर ले आया। उसकी आँखें अभी भी बंद थी, या तो उसे मजा आ रहा था या अपनी इज्जत तार तार होते अपनी आँखों से देखना नहीं चाहती थी।

मजा न आ रहा होता तो सिसकारियाँ क्यों भरती।

मेरा लंड खड़ा हो गया था, मैंने अपने शरीर से बनियान लुंगी को अलग कर दिया। फिर रेखा के बाजु में लेटकर सारे शरीर को चूमने लगा। फिर रेखा को करवट दिलाकर उसकी पीठ को सहलाते चूमते उसकी ब्रा का हुक खोल दिया।

रेखा ने अपनी ब्रा को हाथों से दबा लिया बोली- जीजू, क्या कर रहे हो? ये मत करो प्लीज।

मैंने कहा- तुम्हारी इच्छा तो है फिर यह दिखावा क्यों?

बोली- मैंने कभी किसी पराये मर्द के बारे में ऐसा नहीं सोचा।

मैंने कहा- रेखा, आज हमारे जिस्मों में जो आग लग गई है, उसे बुझाना जरुरी है, वर्ना यह आग बहुत कुछ जलाकर रख देगी।

फिर मैंने उसकी ब्रा निकालकर दूर फेंक दी और उजागर हुए जादू के अमृतकलश से अमृत का रस पान करने लगा। उन्हें चाट चाट कर लाल कर दिया।

रेखा की हालत ऐसे हो रही थी जैसे वो स्वास रोग की मरीज हो, हर साँस के साथ आवाज आ रही थी। इतने बड़े मम्मे सहलाने, दबाने और चूसने का आनन्द अलौकिक था। एक हाथ से मम्मे सहलाते हुए नाभि का चुम्बन ले रहा था, दूसरे हाथ से चूत को सहलाने लगा।

उसकी पेंटी बहुत गीली हो चुकी थी। मैं पेंटी को नीचे सरकाने की कोशिश करने लगा मगर रेखा ने इस पैर तरह भीनच लिए कि पेंटी जरा भी नहीं खिसकी।

अब मैं अपने होंठ नाभि से कमर फिर पेंटी पर फिराने लगा ठीक चूत के पास पहुँचकर जीभ से पेंटी के ऊपर से ही चूत को सहलाने लगा, होंठों से दबाना उसे अच्छा लगने लगा, अपने आप को ढीला छोड़ दिया उसने।

अब एक अंगुली पेंटी के बाजु से चूत के छेद पर रखकर धीरे से दबाव बनाया तो अंगुली चूत के अन्दर चली गई उसे भीतर बाहर इस तरह से कर रहा था कि साथ में दाने को भी रगड़ मिलती जाये।

अब रेखा ने पैरों को ढीला कर दिया, मैंने पेंटी थोड़ी नीचे करके चूत के उपरी भाग पर होंठ रख दिए, रेखा अनियंत्रित सी हाथ पैर पटक रही थी, कभी मेरे सिर को अपनी चूत पर दबा रही थी।

मैंने मौका देख पेंटी निकाल फेंकी, फिर उसकी चूत को जीभ से सहलाया।

मेरे लंड में चिकनापन आता जा रहा था प्रि-कम की बूँदें निकल आई, इस बीच मैंने अपनी चड्डी भी निकाल दी फिर पेट को चूमता स्तनों तक आया उन्हें चूमकर रेखा के होंठ एक बार फिर अपने होंठो में ले लिए।

अब मेरा तन्नाया लंड रेखा की चूत पर दस्तक दे रहा था।

रेखा अपनी कमर को बार बार ऊपर नीचे हिला रही थी, रेखा के पैर फैले होने की वजह से लंड सीधा मुहाने पर और क्लिटोरिस दाने पर घर्षण कर रहा था।

मैंने रेखा का हाथ नीचे करके लंड पकड़ा दिया जिसे उसने थोड़ी देर धीरे धीरे ऊपर नीचे करते हुए चूत के मुहाने पर रख कर नीचे से कमर को ऊपर ठेल दिया। आधा लंड चूत में चला गया और जोर से सिसकारी निकल पड़ी उसके मुख से।

अब मैंने स्तनमर्दन करते हुए जोर का धक्का मारा तो पूरा साढ़े छह इन्च का लंड चूत में समा गया।

रेखा- उई माँ !! कह कर चीख उठी ! आपका मोटा है ! धीरे करो जीजाजी !

देर से बोली पर बोली तो सही।

थोड़ी देर बाद मैंने कहा- अब तो दर्द नहीं है न?

बोली- नहीं ! अब करते जाओ ! मजा आ रहा है !

फिर झटके पर झटका और धक्के पर धक्का जो शुरू किये तो कुछ ही देर में उसका बदन अकड़ने लगा, मुंह से अजीब सी नशीली आवाजें निकलने लगी और एकदम मुझसे लिपट गई।

मुझे कुछ पल रुकना पड़ा, मैं समझ गया कि भाभी श्री तो झड़ गई !

मैंने कहा- मजा आया डार्लिंग?

बोली- हाँ !

फिर मेरे पीठ पर हाथ फिराने लगी।

मैंने फिर धक्के लगाना चालू किए, अब वो कमर उठा उठा कर मेरा साथ दे रही थी, साथ ही मैं उसके स्तन मसल रहा था, गर्दन और कान के पास चूम रहा था।

मैंने कहा- रेखा भाभी, मैं झड़ने वाला हूँ, कहाँ निकालूँ अपना माल?

बोली- अन्दर ही झड़ जाओ, मुझे अच्छा लगता है।

फिर मैंने अपनी गति बढ़ा दी। कमरे में हम दोनों की मिश्रित आवाजें हांफते हुए आ रही थी, स्पष्ट शब्द नहीं निकल रहे थे, रेखा और मैं साथ में झड़ गए।

फिर हम अपनी सांसों पर नियंत्रण पाने के लिए एक दूसरे से लिपट कर निढाल हो गए।

थोड़ी देर में रेखा बोली- जीजू, एक बजने वाला है, उठो, खाना बना लें।

मैंने कहा- एक बार और कर लें ! खाना फिर बना लेना।

रेखा बोली- अब हरगिज नहीं ! मेरा अंग अंग दुःख रहा है, फिर दीदी पूछेगी कि इतना लेट क्यों हो गए तो क्या कहेंगे?

मैंने कहा- कह देना कि जीजाजी देर से आये थे सो लेट हो गए।

‘जीजू, बहुत चालू हो आप !’ कहकर हंसने लगी वो !

फिर हमने एक दूसरे को साफ किया, वो खाना बनाने लगी, मैं लेट गया, शाम को किसी बहाने से उसे फिर से घर लाने की योजना सोचने लगा।

कल तीसरा दिन है, मेरी जान कल बेटे को लेकर घर आ जाएगी, यानि आज शाम और कल सुबह का वक्त है हमारे पास !

कहानी जारी रहेगी।
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