गेटपास का रहस्य-2

दीप ने मयूरी के कान में कहा- क्यों क्या हुआ? पसंद नहीं आये क्या मेरे भैया?

मयूरी- नहीं ऐसी बात नहीं है।

दीप- फिर जाओ उनके पास और बात करो ! मैं अभी आई।

और इतना कह कर दीप रसोई में चली गई, मयूरी मेरे सामने खडी हुई थी और मैं सोफे पर बैठा हुआ था। मैं खड़ा हुआ और मयूरी का हाथ पकड़ा तो वो बुरी तरह से कांप गई, उसने अपनी आँखें नीची कर ली, उसका हाथ मेरे हाथ में आया तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई फूल हाथ में ले लिया हो।

मैं- क्या मैं आपको पसन्द नहीं हूँ, अगर तुम बोलो तो मैं चला जाता हूँ।

मयूरी- मैंने कब कहा !

उसका यह जवाब सुनकर मेरा मन गद्गद हो गया, उसका हाथ पकड़ कर उसको सोफ़े पर बैठा दिया और खुद भी उसके साथ चिपक कर बैठ गया, उसका हाथ अब भी मेरे ही हाथों में था, उसने भी अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की, उसका हाथ अपने हाथ में लिए हुए मैं मयूरी से बोला- जबसे तुम को देखा है, तबसे मैं तुमको चाहने लगा हूँ तुम बहुत ही सुन्दर हो।

मेरी बात सुनकर उसने मेरी तरफ देखा, पर कहा कुछ नहीं, उसकी आँखें बता रही थी कि वो भी भी मुझे पसन्द करने लगी है।

मैं उसका हाथ हल्के से दबाते हुए बोला- तुम कुछ तो बोलो?

मयूरी कुछ बोलती, उससे पहले दीप चाय लेकर कमरे में आ गई और वो बोलते-बोलते चुप हो गई।

फिर हम तीनों ने चाय पी, दीप ने मयूरी को छेड़ते हुए उससे बोली- कुछ बात भी की या ऐसे ही चुपचाप बैठे हो तुम दोनों?

दीप की बात सुनकर मयूरी ने अपनी नजरें नीचे झुका ली और जमीन पर बिछे कालीन को अपने पैर के अंगूठे से कुरेदने लगी, बोली कुछ नहीं !

उसको बोलता न देख दीप ने मुझे पूछा- भाई, बात की आपने या नहीं?

मैंने दीप से कहा- अभी शुरू ही की थी और तुम आ गई, इससे मैंने कुछ पूछा था पर तेरे आने से ये चुप हो गई।

“अच्छा जी, मुझसे शर्म आती है अब इसको?” दीप अपनी आँखें निकलती हुई बोली।

दीप ने मुझसे कहा- भाई आप एक काम करो, इसको ऊपर वाले कमरे ले ले जाओ और बात कर लो, पर जल्दी करना, कहीं मम्मी न आ जायें वैसे तो मम्मी को आने में एक घंटा लगेगा।

मैंने दीप से कहा- अगर चाची जी आ गई तो क्या कहोगी?

दीप मयूरी से बोली- एक काम करो, तुम मेरी कुछ किताबें ले जाना, ऊपर अगर मम्मी आएगी भी तो बोल दूँगी, इसको कुछ समझ नहीं आ रहा था और भाई भी आ गए तो मैंने ही भाई को बोला था पढ़ाने के लिए।

मुझे भी दीप की यह बात कुछ हद तक सही लगी, फिर दीप ने कुछ किताब निकल कर मयूरी को दी और कहा- जाओ, अब और खुल कर बात करना !

मयूरी के गाल शर्म से लाल हो गए थे, फिर मैं अपने साथ मयूरी को ऊपर के कमरे में ले गया।

ऊपर आकर मैंने मयूरी के हाथों से किताबें लेकर बेड पर रख दी, हम दोनों अभी खड़े हुए थे। मयूरी का हाथ पकड़ कर उसकी आँखों में देखते हुए बोला- तुमने जवाब नहीं दिया?

मेरी बात जैसे उसने सुनी ही न हो, वो चुपचाप खड़ी रही, उसको चुप चाप खड़ी देखकर मैं मयूरी से बोला- अगर ऐसे ही चुप रहना है तो मैं जा रहा हूँ।

इतना कह कर जैसे ही मैं मुड़ने को हुआ, मयूरी ने मुझे पकड़कर मेरे सीने से लग गई और अपने दोनों हाथों से मेरी कमर पकड़ ली, तभी एकाएक वो मेरे गाल को चूमने लगी।

अचानक हुए इस हमले से मैं हैरान हो गया, मुझे मयूरी से ऐसी आशा नहीं थी पर अब मैं बहुत खुश था क्योंकि उसने मेरे गालों को चूम कर अपना जवाब दे दिया था। इससे अच्छा जवाब मुझे आज तक किसी ने नहीं दिया था।

अपने प्यार का इजहार मयूरी ने बहुत ही अनोखे अन्दाज से किया था, फिर मयूरी ने मेरे सीने पर अपना सर रख दिया और अपने दूसरे हाथ से मेरे सीने को सहला रही थी। मैंने मयूरी के माथे पर चुम्बन किया और उसका चेहरा अपने एक हाथ से ऊपर की ओर किया तो उसने अपने आँखें बंद कर ली, मेरा एक हाथ उसकी कमर में लिपटा हुआ था। मैंने उसकी दोनों आँखों को चूमा फिर उसके माथे को चूमा।

अब शायद उसको भी अन्दाजा हो गया था, कि अब आगे क्या होने वाला है, तभी तो उसकी दिल की धड़कनें बहुत तेजी से बढ़ने लगी थी, उसकी दिल की धडकन मुझे साफ़ साफ़ सुने दे रही थी। उसके पतले-पतले होंठ, धडकनों की ताल पर थिरक रहे थे। मैंने अपने होंठ को उसके थिरकते होंठों के ऊपर रख दिए अब उसके लबों की थिरकन बन्द हो चुकी थी।

उसने मुझे अपने दोनों हाथों से इस तरह जकड़ लिया था मानो कह रही हो समां जाओ मुझमें। फिर मैं उसके नीचे वाले होंठ को अपने होंठ में दबा कर उसके लबों का अमृत रस पीने लगा, क्या मस्त स्वाद था उसके होंठों का, मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैंने गुलाब की पंखुड़ियों पर अपने होंठ रख दिए हो और उसका स्वाद ऐसा जैसे मीठे मीठे रसगुल्लों का।

अभी मुझे उसके लबों का रस पीते हुए दस मिनट ही हुये थे। मुझे लगा कि कोई सीढ़ियों से कोई ऊपर आ रहा है, इसलिए मैंने मयूरी के लबों को अपने होंठों की कैद से आजाद कर दिया और फिर मैं मयूरी से धीरे से बोला- लगता है कोई आ रहा है।

इतना सुनते ही वो भी मुझसे लग हो गई और अपनी उखड़ी हुई सांसों को नियंत्रण करने की कोशिश करने लगी और इधर मैंने जल्दी से एक किताब अपने हाथ में ले ली कि देखने वाले को यह लगे कि मैं उसको पढ़ा रहा हूँ।

अभी हम दोनों सम्भले ही थे कि दीपशिखा कमरे के गेट पर खड़ी हो गई और वो हम दोनों को घबराया हुआ देख कर उसकी हंसी निकल पड़ी। दीप के हँसने के अंदाज से मुझे यह आभास हो गया था कि अभी सब कुछ ठीक है।

दीप ने मुझसे कहा- सॉरी भाई ! मैंने आपको डिस्टर्ब किया।

मैंने दीप से कहा- कोई बात नहीं बोलो तुम?

ये शब्द मैं दीप से कह जरूर रहा था पर मुझे दीप पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि इसको भी अभी ही आना था !

अभी मैं सोच ही रहा था कि दीप की आवाज मेरे कानों में सुनाई पड़ी- भैया, मम्मी अभी आई थी।

दीप ने इतना ही कहा था कि मेरी और मयूरी की हालत खराब हो गई, मैंने दीप से पूछा- क्या चाची जी आई गई हैं?

दीप ने कहा- आई थी पर घबराने बात नहीं है, मम्मी पड़ोस वाली आंटी के साथ मार्किट कुछ सामान लेने गई है। बस वो मुझे इतना ही बताने आई थी और वो अब कम से कम दो घंटे से पहले नहीं आयेंगी इसलिए आप दोनों आराम से बात करो !

दीप की बात सुनकर मेरी जान में जान आई और अब मयूरी के चेहरे पर भी ख़ुशी की झलक दिखाई दे रही थी।

दीप ने मुझसे कहा- भाई, आपकी इससे कुछ बात हुई या नहीं या ये अभी भी शरमा रही है?

दीप की बात सुनकर मयूरी ने अपनी नज़र नीची कर ली, मैंने दीप से कहा- हाँ, कुछ बात तो हुई है, और कुछ रह रही है।

दीप ने कहा- ठीक है, आप बात करो मुझे घर का काम निपटाना है, मैं तो चलूँ !

और इतना कह कर वो जाने के लिए मुड़ी और जैसे ही जाने को हुई तो वो रुक गई, जैसे उसको कुछ याद आया हो। दीप वापस हमारी तरफ मुड़ी और वो बोली- सॉरी भाई, मयूरी से कुछ कहना था, वो तो मैं भूल ही गई !

और फिर वो मयूरी के पास पहुँची और उसके कान में दीप ने बहुत धीरे से कुछ कहा जो मुझे सुनाई नहीं दिया पर दीप की बात सुन कर मयूरी अब कुछ ज्यादा ही शरमा रही थी। दीप ने मयूरी से जो कहना था, वो कहा और वो जैसे आई थी वो वैसे ही नीचे वापस चली गई।

कहानी जारी रहेगी।

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