मैंने प्यार किया

जिम्मी 2010-10-07 Comments

मैं आप सब को अपना थोड़ा सा परिचय दे दूं। मैं 21 साल का एक ठीक ठाक दिखने वाला लड़का हूँ। मैं ऊपर वाले की कृपा से बी टेक आखरी साल का छात्र हूँ।

मेरी यह जो कहानी है वो दिल्ली में मेरे साथ घटी, वैसे तो मैं यू.पी. का रहने वाला हूँ और अपनी पढ़ाई यहीं पर कर रहा हूँ। मेरे सबसे छोटे मामा से मैं काफी मजाक करता हूँ, सामान्य मजाक सिर्फ, कोई अश्लील मजाक नहीं।

तो दोस्तों जब मेरा छटा सेमेस्टर ख़त्म हुआ तो उसके बाद मेरी लगभग दो महीने की छुट्टियाँ थी.. मैं भी घर में बोर ही हो रहा था तो सोचा कि क्यों न मामा के पास कुछ दिन के लिए हो आऊँ।

मैंने घर में पूछा तो घर वालों ने कहा- हाँ चला जा, वहाँ रहेगा तो तेरा मन भी बहल जायेगा।अगले दिन मैं सुबह की ट्रेन से दिल्ली पहुँच गया। मामा मुझे स्टेशन पर लेने आ गए थे। मैं एक बात बता दूँ कि मेरे ये मामा अभी अविवाहित हैं तो इसीलिए मेरी इनसे इतनी अच्छी पटती है।

मैं मामा के साथ बातें करता हुआ उनके फ्लैट पर पहुँच गया। वो पुरानी दिल्ली में रहते हैं।

वैसे भी दिल्ली पहुँचते पहुँचते 11 बज गए थे। मैं थोड़ी देर उनसे ही बातें करता रहा। फिर वो बोले- चल, खाना खा आते हैं।

क्यूँकि मामा अकेले रहते हैं तो वो ज़्यादातर खाना बाहर ही खाते हैं।

मैं उनके साथ खाना खाकर आया तो लगभग 1:30 बज रहा था। मैंने सोचा कि थोड़ी देर सो लेता हूँ उसके बाद शाम को देखते हैं क्या प्लान बनता है।

मैं सोकर जब उठा तो लगभग 5 बज रहे थे। सारी थकन उतर चुकी थी। सोचा कि क्या किया जाये। रविवार होने की वजह से मामा की छुट्टी थी तो वो अपने एक दोस्त के घर बराबर में चले गए थे।

मैं उठा, टी वी देखने लगा। लगभग 6:30 बजे मामा आए, उन्होंने बताया कि आज उनके एक दोस्त का जन्मदिन है तो वो आज उसके साथ जा रहे हैं और रात को ही आएँगे।

मैंने सोचा- भेनचोद, ये क्या के एल पी डी हुई है मेरे साथ। मैं यहाँ आया था मस्ती करने और ये ही जा रहे हैं।

वो जाते हुए बोल गए कि खाना बाहर खा लेना और सो जाना, हो सकता है उन्हें देर हो जाये। तो वो जब आएंगे तो कॉल कर लेंगे और दरवाज़ा खोल देना।

मैंने कहा- ठीक है मामा।

वो चले गए।

मैंने सोचा कि अब क्या किया जाये, थोड़ा अँधेरा हो चुका था और मुझे गर्मी भी लग रही थी, मैं छत पर आ गया।

आपको तो पता ही होगा कि पुरानी दिल्ली में घर कितने मिले हुए होते हैं, आप एक छत से कूद कर दूसरी छत पर जा सकते हैं। शाम को हल्की रोशनी थी, मैं इधर उधर टहलने लगा।

इधर उधर टहलते हुए मेरी नज़र अपने बराबर वाले घर पर पड़ी। वहाँ पर कपड़े सूख रहे थे। मैंने इतना ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन उसके बाद जो नज़ारा मेरे सामने आया शायद उसे बस मैं महसूस ही कर सकता हूँ अभी तक। कपड़ों के पीछे से मुझे एक ऐसे मुजस्समे का दीदार हुआ जिसको देखते ही मुझे ऐसा लगा के वक़्त बस यहीं रुक जाये और मैं उसे ऐसे ही देखता रहूँ।

उस लड़की में पता नहीं क्या कशिश थी कि मैं उसे एकटक देखता रहा। वो शायद करीब बीस साल की होगी ऐसा मैंने उस समय अंदाज़ा लगाया।उसका सारा ध्यान उस समय कपड़े उतारने पर था तो उसने मुझे देखा नहीं और मेरी नज़रें उस पर से हटी नहीं।

करीब दस मिनट बाद वो कपड़े उतार कर नीचे चली गई और मैं मन ही मन खुश हो गया। वोह मेरे दिल में एक प्यार का बीज बो गई थी शायद।

इससे पहले मुझे कभी ऐसा एहसास नहीं हुआ था। यह थी मेरी उस से पहली मुलाकात। मुलाकात क्या, यूँ कहिये की मुँह दिखाई।

फिर मैं भी नीचे आया और थोड़ी देर बाद खाना खाकर, आकर लेट गया..

मेरी आँखों से तो नींद गायब थी, आज एक नायाब चीज़ का दीदार जो हुआ था।

खैर थोड़ी देर बाद मेरे मोबाइल की घंटी बजी तो मैंने देखा मामा का फ़ोन था। मैंने उठ कर दरवाज़ा खोला तो मामा ने अन्दर आते ही पूछा- सोया नहीं अब तक?

मैंने कहा- नहीं अभी तक तो नहीं..

तो वो बोले- चल, मुझे तो बहुत नींद आ रही है, मैं तो सोने जा रहा हूँ तू भी सो जा।

मैं वापस आकर बिस्तर पर ढेर हो गया।

जैसे तैसे रात कटी, सुबह मैं फिर छत पर टंगा हुआ था इस आशा में कि शायद वो फिर से दिखाई दे जाये पर झांटू किस्मत में शायद ऐसा नहीं लिखा था तो मैं किसी बुड्ढी औरत के लटके हुए वक्ष की तरह मुँह लटका कर वापस नीचे आ गया।

नीचे आकर देखा तो मामा ऑफिस के लिए तैयार हो रहे थे, उन्होंने पूछा- कहाँ गया था?

मैंने कहा- कहीं नहीं ! बस छत पर टहलने चला गया था..अब उन्हें क्या बताता कि मैं क्यों गया था।

उसके बाद मैंने दोनों के लिए थोड़ा नाश्ता बनाया और नाश्ता करके मामा अपनी जॉब पर निकल गए। मैं भी नहा धोकर घूमने निकल गया।

वैसे तो मैं दिल्ली कई बार आ चुका था तो मुझे ज़्यादातर जगह पता थी इसलिए कोई परेशानी नहीं हुई। दिल्ली में लड़कियाँ कितनी चालू हैं यह भी आप सब जानते ही होंगे तो मैं दिन भर बस में घूमता रहा और लड़कियों और आंटियों की गांडों पर लंड मलता रहा। ऐसी ही दिन निकल गया और लगभग 4 बजे वापस आया। मैं काफी थक चुका था सो आते ही सो गया लेकिन 6:30 का अलार्म लगा कर क्योंकि मुझे सात बजे फिर से छत का दौरा करना था।

जब अलार्म से मेरी नींद खुली तो मामा तब तक आ चुके थे और मेरे उठते ही मुझसे बोले- ले चाय पी ले।

मैंने जल्दी से उठ कर हाथ-मुँह धोया और चाय पीकर मामा से बोला- मामा, आओ छत पर चलते हैं।

मामा बोले- चल ठीक है।

आज सुबह तक तो मेरी किस्मत गांडू थी पर अब बुलंद निकली, वो छत पर ही टहल रही थी। मेरी तो बाछें खिल गई और दिल में देसी घी के लड्डू फूटने लगे।

हल्के हरे रंग के सूट में वो गज़ब की लग रही थी। मामा तो यहाँ काफी समय से रह रहे थे तो उनकी जान पहचान भी थी आस-पास वालों से तो वो मामा की तरफ हाथ हिला के बोली- हाय भैया..

मेरे मामा ने भी हाथ हिला कर जवाब दिया- हाय !

मेरे लंड ने भी अपने आप को हिला कर कहा- “हाय”

फिर मामा ने पूछा- कैसी हो?

तो वो बोली- ठीक हूँ, आप सुनाओ !

और ऐसे ही दोनों अपनी छतों पर पास में आकर बातें करने लगे। वो दोनों बातें कर रहे थे और मुझे उसे निहारने का भरपूर मौका मिल रहा था। मैं सोच रहा था मामा मेरी पहचान कब करवाएगा इससे।

पर मामा तो लगा हुआ था अपनी बातों में। मैंने सोचा कि भेनचोद यह क्या चुतियागर्दी है कि मैं यहाँ चूतिया बना खड़ा हूँ और यह मामा अपना मामा-मिया कर रहा है।

वो बार बार मेरी तरफ देख रही थी शायद वो यह जानना चाहती थी कि मैं कौन हूँ। मेरी झांटें आग हो रही थीं और मामा अपनी लाइन लगाने पर तुला था। मुझे मामा से ऐसे हरामीपने की उम्मीद नहीं थी पर मैंने सोचा अभी के लिए इसको देख कर ही काम चलाता हूँ।

हालाँकि उसने दुपट्टा लिया हुआ था और अपना यौवन छुपाने की पूरी कोशिश की थी लेकिन वो मर्द ही क्या जिसकी नज़र से कोई लौंडिया बच निकले वो भी ऐसा माल।

तो मैं थोड़ी देर उसको ऐसे ही ताड़ता रहा, कभी उसका मुँह तो कभी उसके मम्मे ! और मन ही मन मामा को बुरा भला कहता रहा इस हरामीपन के लिए।

तभी थोड़ी देर बाद उसके घर से नीचे से किसी की आवाज़ आई- नीलू ओ नीलू !

जी हाँ ! सही सुना ! मैंने उसका नाम नीलू ही था।शायद उसकी माँ उसे नीचे बुला रही थीं। सो उसने मामा से बाय कहा पर भेनचोद मामा ने अभी भी मेरा परिचय नहीं करवाया उससे।

वो चली गई लेकिन आज उसका नाम मैं जान चुका था। मामा अगर अपना गांडूपना नहीं दिखता तो शायद बात भी हो जाती।

फिर मेरे दिमाग में कीड़ा काटने लगा। मैंने सोचा मामा से ही इसके बारे में पूछता हूँ.. मैं बोला- मामा, यह कौन है?

मामा बोला- अरे यह नीलू है, यार बड़ी प्यारी लड़की है, बी.कॉम कर रही है।

मैंने सोचा भोंसडी की प्यारी है तभी तो पूछ रहा हूँ।

मामा भी बड़ा हरामी है, फिर बोला- तू क्यों पूछ रहा है इसके बारे में?

मैंने कहा- बस ऐसे ही !

पर है तो वो मेरा मामा ही.. हँसते हुए नीचे चला गया। शायद समझ भी गया हो। पर मुझे क्या अब प्यार किया तो डरना क्या।

उसके बाद मैं हर वक़्त उसे देखने के चक्कर में लगा रहता… दो दिन बाद मुझे वो मौका मिल ही गया जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था.. उस दिन मैं अपनी छत पर टहल रहा था शाम को तो वो छत पर आई.. उस दिन तो मैं उससे मिल ही चुका था तो वो थोड़ा तो जानती ही थी।

हालाँकि उससे बात नहीं हुई थी मेरी पर मेरी भी तो अब बर्दाश्त की हद ख़त्म होती जा रही थी.. कब तक उसकी याद में रातें काली करता और बिस्तर गन्दा..

तो मैंने उसकी तरफ देखकर हाय कहा..

उसने भी थोड़ा मुस्कुरा कर हाय कहा..

फिर मैं उसकी छत की तरफ को चल पड़ा और जहाँ उस दिन मेरा मामा खड़ा हुआ बातें चोद रहा था, वहीं जाकर खड़ा हो गया..

मेरी थोड़ी फट भी रही थी क्यूंकि मैं पहली बार उससे बात करने जा रहा था और अगर उसकी माँ या मेरा मामा देख लेता तो इंटरव्यू हो जाता मेरा तो…

फिर मेरे दिमाग में आया कि यार प्यार किया तो डरना क्या ! तो मैंने उससे हिम्मत करके पूछ ही लिया- क्या नाम है तुम्हारा?

वो बोली- “नीलू”

मुझे पहले ही उसका नाम पता था लेकिन बात तो कहीं से शुरू करनी थी न.. फिर मैंने थोड़ी और बातें करने की सोची और वो भी बातें करती रही..

उसने मुझसे भी पूछा कि मैं कौन हूँ वगैरह वगैरह..

मेरी आदत बहुत मजाक करने की है, मैं अपनी तरह ही बातें करता रहा और वो एक दो बार हंसी भी.. मैंने सोचा यहाँ मामा के होने का कुछ तो फायदा मिल रहा है.. मैं भी इन मौकों पर चौका मारता रहा .. हमने बहुत देर बातें की बहुत टॉपिक्स पर फिर उसकी माँ की आवाज़ आई तो वो बोली- अब मैं जाती हूँ..

मैंने सोचा कि इससे पूछ लेता हूँ कि फिर कब मिलोगी?

लेकिन जो उसने बोला उसे सुनकर तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ..

वो जाते जाते बोली- तुम बहुत अच्छी बातें करते हो, अब तुमसे कल बात होगी !

मुझे ऐसा लगा कि मेरा तो दिल वहीं निकल कर गिर पड़ेगा क्यूंकि इतनी तेज़ी से धड़क रहा था वो… अब तो मेरी चांदी ही चांदी थी.. मैं गाने गुनगुनाता हुआ नीचे आया और फिर अगले दिन बहुत ही खुश था.. मेरा दिल तो यह चाह रहा था कि बस दिन निकलने से पहले शाम हो जाये..

जैसे तैसे शाम हुई तो मैं फिर से छत पर पहुँच गया..

उस दिन भी उससे खूब बातें हुई.. अब उसकी और मेरी पक्की दोस्ती हो गई थी.. वो और मैं खूब बातें करते ! उसकी माँ से भी अब मेरी जान-पहचान हो गई थी.. उसकी माँ मेरे मामा को अच्छी तरह से जानती थी इसलिए उसे मेरे से बात करने से मना नहीं करती थी..

ऐसे ही एक दिन हम बाज़ार गए.. सारा काम निपटने के बाद हमने सोचा कि आइसक्रीम खाते हैं..

हम एक आइसक्रीम पार्लर में गए और खाते खाते वो बोली- तुम्हें पता है परसों मेरा बर्थडे है !

मैंने बोला- अरे वाह ! यह तो बहुत अच्छी बात है, पार्टी करेंगे।

तो वो बोली- नहीं, मैं पार्टी नहीं करती, मुझे बर्थडे सादगी से मनाना अच्छा लगता है।

तो मैं थोड़ा निराश सा हुआ यह सुनकर पर फिर वो बोली- तुम हो न मेरे फ्रेंड, उस दिन तुम घर आना !

मैं ख़ुशी से फ़ूला न समाया.. मुझे उस पर बड़ा प्यार आ रहा था.. मुझे उस दिन पता नहीं क्या हुआ मैं उसे लेकर वहाँ से घर जाने के बजाये एक पार्क में ले गया..

वो बोली- यह कहाँ ले आये?

मैंने कहा- नीलू, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।

तो वो बोली- वो तो तुम घर पर भी कर सकते थे, यहाँ क्यों लाये हो?

मैंने कहा- नहीं, यह बात मैं यहीं करना चाहता हूँ।

तो वो बोली- हाँ, बोलो?

मैंने डरते डरते उससे अपने प्यार का इज़हार कर दिया.. पहले तो मेरी बहुत फटी लेकिन जब उसने कहा- मुझे मंज़ूर है !

तो मेरी लाटरी निकल गई.. फिर हम घर आ गए.. और मैं परसों का इंतज़ार करने लगा..आखिरकार वो दिन आ ही गया.. मैं सुबह में ही उसके घर पहुँच गया और उसको हैप्पी बर्थडे कहा .. उसने मुझे थैंकयू बोला और मुझसे हाथ मिलाया.. हाथ क्या मखमल था..

फिर वो मुझे अपने कमरे में ले गई और हम बातें करने लगे .. फिर बातें करते करते वो बोली- लाओ मेरा गिफ्ट !

मैंने उससे कहा- बोलो क्या चाहिए तुम्हें?

उसका जवाब था- तुम… !

मैं तो हक्का बक्का रह गया, ये क्या बोला उसने ..

मैंने फिर पूछा- क्या?

उसने फिर कहा- तुम !

मैं सोचने लगा कि कहीं इसने पी तो नहीं रखी है.. क्या बोल रही है यह..

तभी उसकी आवाज़ आई- क्यूँ? डर गए क्या ?

मैंने सोचा कि यह पागल हो गई है शायद..

वो फिर से बोली- दे सकते हो अपने आपको मुझे?

मैंने सोचा कि जब यही निमंत्रण दे रही है तो मैं क्यों पीछे रहूँ.. मैंने बोला- देखो जो काम तुम कह रही हो उसके बाद रोना मत !

वो बोली- तुम शुरू तो करो..

मैंने कहा- तुम्हारी माँ हैं बाहर !

वो बोली- वो तो अब तक चली भी गई होगी.. उन्हें थोड़े काम से जाना था अपनी सहेली के यहाँ !

अब मैं थोड़ा जोश में आ गया और मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर चूम लिया.. उसकी और मेरी दोनों की आँखें बंद थी.. और शायद यह मेरा और उसका पहला ही चुम्बन था.. इतना गहरा चुम्बन उसके बाद शायद ही मैंने कभी लिया होगा.. मेरी और उसकी साँसें बहुत तेज़ हो गई थी जिसे मैं महसूस कर रहा था.. पहला प्यार होता ही ऐसा है दोस्तों..

चूमने के बाद मैंने उसे अपने अलग करते हुए कहा- तुमने पहले कभी किया है क्या?

तो वो मेरी आँखों में देखती हुई बोली- तुम पहले इंसान हो जिसने मुझे छुआ है.. मैंने अभी तक किसी को हाथ तक नहीं लगाने दिया.. बिल्कुल कोरी हूँ मैं !

यह सुनकर मैंने उसके चूचियों पर हाथ रखा और हल्के से दबाया.. उसने उफ़ किया और थोड़ा कसमसाई..

फिर मैंने थोड़ा दबाव डालकर दबाया तो वो तड़पते हुए बोली- मैंने तुम्हें अपने आप को सौंपा है, जो भी करो प्यार से करना !

मैंने फिर हल्के हल्के उसकी चूचियों को दबाना शुरू किया.. उसे थोड़ा दर्द भी हो रहा था और वो थोड़ी थोड़ी देर बाद उफ़ किये जा रही थी..

मैंने फिर उसे चूमा और उसकी कमीज़ उतार दी.. अन्दर का नज़ारा तो बड़ा ही शानदार था.. काली ब्रा में उसके नुकीले निप्पल पता चल रहे थे.. मैंने उसकी ब्रा का इलास्टिक खीच कर छोड़ दिया.. वो उसके लगा तो उसने आउच किया .. फिर एक मुक्का मेरे को मारा हल्के से गुस्से में…

मैंने फिर उसकी ब्रा उतार दी.. और उसके निप्पल बिलकुल पेंसिल की नोक की तरह थे.. उसके दूध ज्यादा बड़े नहीं थे.. खिलती जवानी थी एकदम..

फिर मैंने उसके निप्पल को अंगूठे और ऊँगली के बीच रख कर खींचा तो उसकी सिसकारी निकल गई..उससे भी शायद बर्दाश्त नहीं हो रहा था और मुझसे भी नहीं.. फिर मैंने जीभ निकल के जीभ की नोक उसकी निप्पल की नोक पर लगाई तो वो एकदम सिहर गई… मैंने दूसरे निप्पल के साथ भी ऐसे ही किया..फिर मैंने उसका एक निप्पल मुँह में लिया और हल्के से चूसा.. वो उफ़ ही करती रही..

मैंने फिर थोड़ी देर उनको हल्के-हल्के चूसा तो वो अपना सर इधर उधर करने लगी.. ​यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉम पर पढ़ रहे हैं।

मैंने फिर उसका निप्पल अपने दांतों के बीच लेकर हल्के से काटा तो बोली- क्या कर रहे हो? दर्द होता है उफ़…

मैंने दोनों निप्पलों के साथ ऐसा ही किया.. उसके बाद मैं उसे तड़पाने के लिए ऐसे ही पीछे हट गया तो वो आकर मुझसे लिपट गई.. बोली- मुझे ऐसे छोड़ कर मत जाओ, मुझे अपनी बना लो..

मैंने अपने सारे कपड़े उतारे और नंगा होकर उसके सामने लंड हिलाने लगा और उससे बोला- तुम्हें इसे चूसना पड़ेगा !

वो बोली- मुझे आता तो नहीं लेकिन मैं कोशिश करुँगी..

फिर वो अपने घुटनों पर बैठ कर लण्ड को मुँह में लेकर चूसने लगी.. मुझे तो बड़ा मज़ा आया.. वो जैसा भी चूस रही थी मेरे लिए तो पहली बार ही था.. मैंने सोचा अगर अब और चुसवाऊँगा तो झड़ जाऊँगा.. मैंने उसे उठाया और उसको भी नंगा कर दिया.. उसको लिटाया.. और उसकी योनि में उंगली करने लगा..

वो बोली- आज मेरा असली बर्थडे मना है !

उसे थोड़ा दर्द भी हो रहा होगा पर उसने कहा नहीं.. मैं फिर दो उंगली करने लगा.. थोड़ी देर बाद वो बोली- यार, अब डाल दो, सींच दो मुझे अपने पानी से !

मैंने बोला- देखो थोड़ा दर्द होगा, सहन कर लेना !

फिर मैंने नारियल का तेल अपने लंड पर और उसकी चूत पर लगाया और अपना लिंग उसके मुहाने पर रख दिया.. वो काँप रही थी.. मैंने थोड़ा रुक कर हल्का सा जोर लगाया और हल्के-हल्के अन्दर करने लगा..

उसको तकलीफ हो रही थी, यह उसकी बेचैनी से पता चल रहा था..

मैंने सोचा ऐसे तो यह हल्का दर्द होता रहेगा.. अब एकदम कर देता हूँ..

मैंने एकदम झटका दिया और लंड घुसेड़ दिया .. वो एकदम से तड़प उठी और उसकी चूत से खून आया थोड़ा और वो अपना सर इधर उधर पटकने लगी और थोड़े घूंसे मारने लगी मुझे हटाने को.. लेकिन मैं उसे जोर से पकड़े रहा..

उसका दर्द कम होने का इंतज़ार करने लगा..

थोड़ी देर में वो थोड़ी सामान्य हुई तो मैं धीरे-धीरे अन्दर-बाहर करने लगा.. फिर उसका दर्द हल्का होने लगा तो वो भी हल्के हल्के सीत्कारने लगी तो मैं भी अब थोड़ा तेज़ हो गया..

फिर मैंने उसे घोड़ी बना दिया.. मुझे यही पोजीशन सबसे ज्यादा पसंद है.. फिर मैं उसके पीछे आकर अपने लंड से उसके चूतड़ों पर मारने लगा.. वो भी अपने चूतड़ हिला कर दिखा रही थी.. मैंने फिर पीछे से लंड डाला तो वो चिहुंक उठी.. अब मैं फिर से मस्ती में आगे पीछे होने लगा.. मैं उसकी गांड पर थप्पड़ मार रहा था और वो आह आह कर रही थी..

फिर मैंने उसके मम्मे पकड़ लिए और चोदने लगा.. मैं उसकी गर्दन पर चूम रहा था और उसकी कमर पर हाथ फिरा रहा था.. उसे गुदगुदी भी हो रही थी.. अब वो भी मेरे धक्कों से कदम मिला रही थी.. जब मैं आगे होता वो पीछे होकर पूरा लंड लेती.. मैंने दोबारा उसके मम्मे पकड़ लिए और उसका मुँह पीछे करके उसका चुम्बन लेने लगा.. मैं बिल्कुल उससे चिपका हुआ था.. यह आसन कितना सेक्सी होता है यह मैं ही जान सकता हूँ दोस्तो.. उसके दोनों मम्मे मेरे हाथों में थे.. मेरा लंड उसकी चूत में और दोनों चुम्बन करते हुए.. फिर मैं उसको झुका कर दोबारा से धक्के मारने लगा.. अब मैं भी बहुत तेज़ धक्के मार रहा था क्यूंकि मेरा भी होने वाला था.. मैंने उससे पूछा- नीलू, मेरा होने वाला है, कहाँ निकालू?

वो बोली- मेरा यह पहला प्रेम है, मेरे अन्दर ही डालना..

मैं दो धक्कों बाद ही उसके अन्दर झड़ने लगा और सपनों की मीठी दुनिया में खो गया..

हम दोनों निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़े और जोर जोर से साँसें लेने लगे.. थोड़ी देर के बाद दोनों सो गए…

दोस्तो, आपको मेरी कहानी कैसी लगी, बताइएगा ज़रूर.. अपनी राय अवश्य दें.. अच्छी या बुरी जैसी भी हो.. मुझे आपके मेल का इंतज़ार रहेगा..

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