अगर खुदा न करे… -2

(Agar Khuda Na Kare-2)

लीलाधर 2015-11-13 Comments

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आधा घंटा हम चारों का बंद कमरे में एक साथ हुए बीत गया था, मंजिल अभी दूर थी।
लूडो ने इतना कर दिया था कि मेरी बीवी के सख्त रवैये में नरमी ले आए। लेकिन इस बदलाव को मुकाम तक ले जाने के लिए अब कुछ तेज करने की जरूरत थी। साँप-सीढ़ी को दुबारा खेलना उबाऊ होता।
मैं प्रकाश को देख रहा था, कि क्या करेगा?
उसके चेहरे पर भी उलझन थी।

मैंने लूडो को परे सरकाते हुए कहा- लड़कियों को खेल जीतने की बधाई! कुछ ईनाम लेना है तो मांग लो, आज हम मूड में हैं।
सुषमा बच्चों-सी ताली बजाकर हँस पड़ी, देखा-देखी अंजलि भी मुसकुराई।
‘मांगूँ…?’
‘सचमुच!’ प्रकाश ने सिर हिलाया।
‘मुझे हीरे के टॉप्स चाहिए।’

सुषमा में अभी भी बचपना था, इस वक्त कोई सेक्सी चीज मांगनी चाहिए थी! खैर, प्रकाश ने हाँ कर दिया।
अंजलि चुप थी।
सुषमा ने उसको टोका- तुम क्या मांग रही हो?

अंजलि ने इनकार में सिर हिला दिया, वह गंभीरता बरत रही थी।
मैंने अपनी तरफ से घोषणा की- एक सुंदर सी नथ!
‘अरे वाह! अभी भी भाई साहब नथ उतारने का ख्वाब देखते हैं। क्या बात है?’
‘मैं ख्वाब नहीं देखता, हकीकत में करता हूँ।’

मैं उठा और अपने बैग से एक सुनहले रंग का बॉक्स निकाल कर ले आया, इसे मैंने पहले ही खरीद रखा था, आज चुपके से साथ रख लिया था।
मुझे नथ की कल्पना बड़ी उत्तेजक लगती थी और सोचा था कि आज अगर संभोग हो गया तो अंजलि को गिफ्ट करूँगा और कहूँगा- यह लो, आज तुम्हारी एक और नथ उतरी।

अंजलि हैरान थी और शर्म से लाल भी… कभी मुझे देख रही थी, कभी उस बक्से को जिसमें लाल मखमली सतह पर सोने की नथ झिलमिला रही थी- कब खरीदी?
चकित सुषमा और प्रकाश भी थे- आपने तो कमाल कर दिया?
उस अनुभवी और गर्वीले प्रकाश पर बढ़त बनाकर मेरा सीना चौड़ा हो गया।
सुषमा ने टिप्पणी की- इसको कहते हैं प्यार!
सुनकर प्रकाश थोड़ा झेंप भी गया।

मैंने अगले कदम का नेतृत्व थाम लिया। अंजलि को फँसाने के लिए बचपन में खेला जाने वाला एक खेल इस सिचुएशन में चमत्कारिक रूप से फिट हो रहा था, मैंने कुटिलता को छिपाते हुए कहा- अब अंजलि मुझे बताएगी कि वह मुझे कितना प्यार करती है।
‘वो कैसे?’
जी चाहा कि अपनी जानेमन दिलरुबा बीवी को वहीं चूम लूँ पर मैंने सस्पेंस को बरकरार रखते हुए जेब से रूमाल निकाला और उसे पट्टी सा बनाते हुए अंजलि की सवाल और आश्चर्य से फैली आँखों पर रख दिया।
सुषमा ने रूमाल के सिरों को बाँध दिया।

पट्टी की कसावट को जाँचने और यह पक्का करने के बाद उसे कुछ दिख नहीं रहा है, मैंने कहा- अंजलि, तुम मुझे मेरी छुअन से ही पहचान कर दिखाओगी। हम तीनों तुमको छुएंगे और तुमको बताना है कि कौन सा स्पर्श मेरा है। वैसे अब तक तुम हम तीनों की छुअऩ से वाकिफ हो ही चुकी हो।
‘हाँ.. हाँ.. यह तो मजेदार रहेगा।’
छुआ-छुई का बचपन का खेल… आज यौवन में उसकी अलग परिभाषा हो रही थी।

सुषमा ने शुरूआत की, उसने उसका माथा छुआ। अंजलि ने हाथ बढ़ाकर पकड़ा तो मैंने रोका- तुम्हें अपने हाथ में लेकर देखना नहीं है, खाली स्पर्श से ही पहचानना है।
वह औरत के हाथ को पहचान चुकी थी, बोली- सुषमा।

‘बिल्कुल सही!’ प्रकाश बोला।
मैंने टोका- लेकिन इस बार तो तुम हाथ से पकड़कर पहचान चुकी थी। अबकी बोलो?” मैं अंजलि को सम्हलने का मौका नहीं देना चाहता था। उसकी चादर कंधों से गिर चुकी थी और ब्लाउज में कसे कंधे और वक्ष प्रकट हो गए थे। अंजलि को इसका पता चल गया था और वह फिर से चादर कंधों पर खींच रही थी।

मैंने जैसे ही ‘अबकी बोलो’ का वाक्य खतम किया कि प्रकाश ने उसकी बाँह छुई। अंजलि पहचानने की कोशिश करने लगी, बोली- ऐसे कैसे होगा, सिर्फ़ छूने से कैसे पता चलेगा?
ठीक है, हम थोड़ा ज्यादा छुएंगे, तुम्हें पता चलने लायक!’

प्रकाश के चेहरे पर खुशी दौड़ गई। उसने उसकी बाँह सहलानी शुरू कर दी। लेकिन डरते हुए हाथ कपड़े पर ही रखा, नीचे नंगे हिस्से पर नहीं ले गया। अंजलि के तेज दिमाग ने इस डर से अंदाजा लगा लिया- प्रकाश!

‘अरे वाह!’ हम तीनों के मुँह से एक साथ निकला।
आँखें बंधी होने के बावजूद उसका दिमाग काम कर रहा था।

‘तुम कब आओगे?’ वह मुझे बुला रही थी।
‘अभी आता हूँ। मैंने कहा।

एक हाथ उसके एक स्तन पर आया।
अंजलि चौंककर हाथ बढ़ाते हुए बोली- यह क्या कर रहे हो?
मैंने उसके बढ़ते हाथ को पकड़ लिया- ऊँहूँ, तुम्हें सिर्फ छूने को महसूस करना है।
‘मगर…’
‘कहाँ छुएंगे, इसकी तो पाबंदी नहीं थी।’ मैंने जोड़ा।

उसके स्तन संवेदनशील थे। सहलाने से नोंक सख्त होकर उभर गए। अंजलि ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मैंने उसको कोंचा, ‘बोलो!’
सुष… या शायद… प्रका..’ यह अटकाव शर्म की थी, या उत्तेजना की, या उलझन की, पता नहीं… या शायद तीनों की।
वह आगे झुककर वक्षों को यथासंभव छिपाने की कोशिश कर रही थी।

‘एक नाम बोलो- सुषमा, या प्रकाश, या मैं?
‘सुषमा…’ शायद वह मर्द और औरत के स्तन छूने के अंतर को महसूस कर रही थी।
‘करेक्ट!’ इसके साथ ही उसके स्तनों पर हाथ की हरकत बंद हो गई।
मैंने उसके हाथ छोड़ दिए।

लेकिन तभी कोई हाथ उसकी पैरों के पास चादर में अंदर घुस गया।
उसने रोकना चाहा पर मैंने टोका- जानेमन, यह मैं हूँ। तुम्हारी पिंडली छू रहा हूँ।
लेकिन असल में यह प्रकाश की हरकत थी।
‘नहीं, नहीं…’ उसने रोकने के लिए हाथ बढ़ाए।

मैंने उसके ना ना करते मुँह पर एक चुम्बन ठोक दिया, वह ठगी-सी रह गई।
मैंने पूछा- बताओ, यह कौन था?
अंजलि के हाथ आँखों पर से पट्टी हँटाने के लिए उठे मगर सुषमा-प्रकाश ने एक एक हाथ पकड़ लिया।

मैंने जोड़ा, “नहीं, नियम नहीं तोड़ना है। लो, फिर से बताओ।
कहते हुए मैंने उसे फिर चूमा, इस बार दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़कर देर तक चुम्बन दिया।
वह मेरे चुम्बन को पहचान गई और तब उसको लग गया कि साए के अंदर घुस गया हाथ दूसरे का है, उसको पाँव से ठेलने लगी।

उसके विरोध को कमजोर करने के लिए स्तन सबसे जरूरी थे, मैंने एक हाथ से उसका एक एक स्तन थामा और दूसरे पर सुषमा को बुला लिया।
दोनों मिलकर उसके रसीले आमों को दबा-दबाकर चूसने के लिए तैयार करने लगे।
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प्रकाश ने होटल की चादर उसके बदन पर से धीरे धीरे खींच दी, ब्लाउज और साए में औरत का दृश्य तो यों ही मादक होता है, उभरा वक्ष, नंगे पेट की तहें, उसके नीचे साए का बंधन, उसके अंदर नंगे पैर – रसीली योनि का साम्राज्य!
प्रकाश अभी तो अंजलि के पैरों को कपड़े पर से ही सहला रहा था लेकिन उस अकेली पतली परत के जाने में कितनी देर लगेगी।
मेरी उत्तेजना पैंट के बंधन में कसमसाने लगी।

लेकिन असली कसमसाहट तो अंजलि में हो रही थी। उसकी उम्म.. उम्म.. बोलने की कोशिशों को मैं अपने मुँह में दफन कर दे रहा था।
यह एक तरह से जबरदस्ती थी, लेकिन मेरी नजर में वाजिब हद के भीतर। औरत सहमति देती है मगर खुलकर और आसानी से नहीं, उसे प्रायः एक जबरदस्ती की आवश्यक खुराक देनी पड़ती है।

मैंने उसके मांसल स्तनों को पहले कितनी बार सहलाया था मगर आज और ही बात थी। आज उसे नए सिरे से महसूस कर रहा था – मुलायम और लचीले, और भरे-भरे, दबाने पर बच्चों की तरह अंदर से ठेलते। उन्हें नंगे करके चूचुकों पर मुँह लगाने के बाद तो अंजलि के बेबस हो जाने की गारंटी थी। पति होने के नाते मैं उसकी कमजोरी जानता था।

हमारी कोशिशें बेकार नहीं जा रही थीं। प्रकाश अंजलि के पैरों को कभी साए के ऊपर से, कभी उसके अंदर घुसकर सहला रहा था। अंजलि बचाव में पैरों को आगे-पीछे कर रही थे जिसे देखकर मुझे उनके उत्तेजना में बिस्तर की चादर पर रगड़ खाने का खयाल आ रहा था। मैंने हल्के से ही उसके एक पाँव को अपने पाँव से नियंत्रित कर लिया।

अंजलि समझ चुकी थी कि हम तीनों ने उसे खेल खेल में फंदे में ले लिया है। उसके हाथ-पाँव पकड़ रखे हैं। लगातार हो रहा चुम्बनों, स्तन-मर्दन, टांगों के बीच गुदगुदी के हमलों को वह कहाँ तक संभल पाएगी। उसकी तेज चलती साँसों और चेहरे की लाली में गुस्सा और उत्तेजना दोनों की भूमिका था।
मैं कोशिश कर रहा था उसमें गुस्से की भूमिका घटाने की।
जाएगी कहाँ… होंठों और स्तनों पर के अनुभवों को इनकार कर सकना उसके लिए मुश्किल था, असंभवप्राय! वह बेहद संवेदनशील अंगों वाली औरत थी।
कहानी जारी रहेगी।
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