दूसरी सुहागरात-2

(Dusari Suhagraat- Part 2)

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प्रेम गुरु की कलम से…

सम्पादन सहयोगिनी : स्लिम सीमा

हे लिंग महादेव ! प्रेम के हाथ में भी ऐसी रेखा तो है… ओह… हे भगवान… कहीं ??? ओह… ना…??? मैं तो कभी अपने इस मिट्ठू को किसी दूसरी मैना के पास फटकने भी नहीं दे सकती। मैंने अपने मान में निश्चय कर लिया कि प्रेम की खुशी के लिए मैं वो सब करूँगी जो वो चाहता है। मैं प्रेम को यह सुख भी देकर उसकी पूर्ण समर्पिता बन जाऊँगी। मनु स्मृति में लिखा है :

संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्ता भार्या तथैव च:।

यस्मिन्नैव कुले नित्यं कल्याण तत्रेव ध्रुवम्।।

पहले तो मैंने सोचा था कि हम किसी दिन बाथरूम में ही यह सब करेंगे पर बाद में मैंने इसे 11 जनवरी के लिए स्थगित कर दिया।

11 जनवरी को प्रेम का जन्मदिन आता है। मेरे जन्म दिन और विवाह की वर्ष गाँठ पर तो प्रेम मुझे उपहारों से लाद ही देते हैं। मैं भी उनके जन्म दिन पर उन्हें इस बार ऐसा उपहार दूँगी कि वो इस भेंट को पाकर अपने वर्षों की चाहत पूरी करके धन्य हो जाएँगे।

प्रेम तो अपना जन्मदिन किसी होटल में मनाने को कह रहा था पर मैंने मना कर दिया कि हम इस बार उसका जन्मदिन घर पर अकेले ही मनाएँगे। मैं दरवाजे पर खड़ी प्रेम की बाट जोह रही थी। आज तो उसे जल्दी घर आना चाहिए था। मैंने रसोई का काम पहले ही निपटा लिया था और सजधज कर बस प्रेम की प्रतीक्षा ही कर रही थी। मैंने आज दिन में अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाई थी और अपनी दोनों जांघों पर भी फूल-बूटे बनाए थे जैसे मीनल ने मधुर मिलन वाले दिन बना दिए थे। थोड़ी देर पहले ही मैं गर्म पानी से रग़ड़-रग़ड़ कर नहाई थी और अपनी लाडो को ही नहीं महारानी को भी ढंग से सँवारा था। कई बार उसके ऊपर क्रीम लगाई थी और अंदर भी अच्छी तरह अंगुली से बोरोलीन लगा ली थी। हालाँकि ठण्ड बहुत थी पर मैंने आज वही जोधपुरी लहंगा और कुरती पहनी थी जो मधुर मिलन वाली रात में पहनी थी। कानों में छोटी छोटी बालियाँ पहनी थी और बालों का जूड़ा बनाने के स्थान पर दो चोटियाँ बनाई थी। मैं जानती थी आज प्रेम ग़ज़रे तो ज़रूर लेकर आएगा।

मैं तो उसे फोन कर-कर के थक गई पर पता नहीं क्यों फोन बंद आ रहा था।

कोई 8 बजे प्रेम की गाड़ी आती दिखाई दी। मैं आज उसे देरी से आने का उलाहना देने ही वाली थी कि उसने अपने हाथों में पकड़ा बैग और पैकेट नीचे रखते हुए मुझे बाहों में भर कर चूम लिया। मैं तो ओह… उन्ह… करती हो रह गई। उसकी एक छुवन और चुम्बन से ही मेरा तो सारा गुस्सा हवा हो गया।

प्रेम ने बताया कि पहले तो उसके साथ काम करने वालों ने साथ चाय पीने की ज़िद की फिर तुम्हारे लिए तोहफा और ग़ज़रे लाने में देरी हो गई। वो मेरे लिए हीरों का एक हार लेकर आए थे। वो तो मुझे वहीं पहनाने लगे पर मैंने कहा,”अभी नहीं ! रात को पहना देना !”

“ओये होये… आज रात को क्या ख़ास है मेरी स्वर्ण नैना जी ?” कहते हुए उन्होंने एक बार फिर से मेरे होंठों को चूम लिया।

मैं तो मारे लाज के दोहरी ही हो गई, मुझे लगा कि फिर वही रूमानी दिन लौट आए हैं।

प्रेम हाथ-मुँह धोने बाथरूम चला गया। मैंने आज जानबूझ कर बाथरूम में उनके लिए वही सुनहरी कुर्ता और पाजामा रख दिया था जो प्रेम ने मधुर मिलन वाली रात पहना था। प्रेम जब तक बाहर आता मैंने मेज पर केक, मोमबत्ती, मिठाई और खाना आदि लगा दिया।

अब केक काटना था।

पहले तो हमने दो मोमबत्तियाँ जलाईं (एक प्रेम के लिए और दूसरी मेरे लिए) फिर मैंने केक काटने के लिए चाकू उनकी ओर बढ़ाया तो प्रेम ने मेरे पीछे आकर मेरा हाथ पकड़ कर केक काटना शुरु कर दिया। दरअसल केक काटना तो बहाना था, वो तो मेरे नितंबों से चिपक ही गया।

जैसे ही केक काटने के लिए मैं थोड़ी सी झुकी मुझे अपने नितंबों की खाई के बीच उनके खूँटे का अहसास अच्छी तरह महसूस होने लगा। मेरे सारे शरीर में मीठी गुदगुदी सी होने लगी।

प्रेम ने एक हाथ से तो चाकू पकड़े रखा और दूसरा हाथ को मेरी लाडो पर फिराने लगा। उसकी तेज और गर्म साँसें मेरे कानों के पास महसूस हो रही थी।

ऐसी स्थिति में मैं अक्सर तुनक कर कहा करती हूँ,”हटो परे ?”

पर आज मैंने ना तो उसे मना किया ना ही दूर हटाने की कोशिश की।

मैंने केक का एक टुकड़ा उठाया और “हैपी बर्थ डे !” कहते हुए अपना हाथ ऊपर करके प्रेम के मुँह की ओर बढ़ाया। प्रेम तो आँखें बंद किए मेरे बालों और गले को ही चूमे जा रहा था। केक उसके होंठों, गालों और पूरे चेहरे पर लग गया। अब प्रेम ने केक से पुता अपना मुँह मेरे गालों और होंठों पर रगड़ना शुरु कर दिया।

मैं तो ओह… उईईईई… करती ही रह गई।

प्रेम ने भी केक मेरे मुँह पर मल दिया था, हम दोनों का ही चेहरा केक से पुत गया था। अब मैंने थोड़ा सा घूम कर अपना चेहरा उनकी ओर कर लिया तो प्रेम मेरा सिर अपने हाथों में लेकर मेरे चेहरे पर लगी केक को चाटने लगा। मैं भला पीछे क्यों रहती, मैंने भी उनके चेहरे को चाटना चालू कर दिया।

भाभी सच कहती हैं, प्रेम में कुछ भी गंदा नहीं होता। ऐसी छोटी-छोटी चुहल जिंदगी को रोमांच से भर देती हैं।

अब प्रेम ने मुझे फिर से अपनी बाहों में भर लिया और मुझे गोद में बैठाते हुए पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। मुझे अपने नितंबों के बीच उनके खूँटे की उपस्थिति आज बहुत अच्छी लग रही थी। मेरा तो मन करने लगा अभी उनके पाजामे का नाड़ा खोलूँ और अपना घाघरा ऊपर करके उस खूँटे को अपनी लाडो के अंदर समेट लूँ। पर मैं अभी अपने इस रोमांच को समाप्त नहीं करना चाहती थी।

हमने थोड़ा केक और खाया और फिर खाना खा लिया। आज तो प्रेम ने अपने हाथों से मुझे खाना खिलाया था। बीच बीच में वो मेरे गालों पर भी कुछ मीठा या सब्जी लगा देता और फिर उसे अपनी जीभ से चाटने लगता।

खाना खाने के बाद हम एक दूसरे की बाहों में लिपटे अपने शयनकक्ष में आ गये। आज मैंने कमरे में पहले से ही हीटर और ब्लोअर चला दिया था और कमरे को ठीक उसी तरह सजाया था जैसा हमारे मधुर मिलन की रात सज़ा था। मैंने उसी चादर को निकाल कर पलंग पर बिछाया था जो उस रात हमारे प्रेम रस में भीग गई थी। पलंग और पूरे कमरे में मैंने सुगंधित स्प्रे भी कर दिया था। प्रेम पलंग पर बिछी उस चादर और उस पर पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों और साथ पड़ी छोटी मेज पर रखे दूध के थर्मस को देख कर मंद मंद मुस्कुराने लगा।

अब उसने अपनी जेब से वो हार वाली डिब्बी निकाली और मेरे पीछे आकर मेरे गले में हीर-माला पहनने लगा। मैं तो आँखें बंद किए उसी मधुर मिलन वाले रोमांच में खोई रह गई। मैं तो तब चौंकी जब एक बार फिर से उनका ‘वो’ मेरे नितंबों से टकराया। प्रेम का ??एक हाथ फिर से मेरी लाडो को टटोलने लगा था।

“मधुर !”

“हुंअ…?”

“तुम्हारे नितंब बहुत खूबसूरत हो गये हैं !”

“हम्म…”

मैंने भी महसूस लिया था कि जचगी के बाद मेरी कमर का माप भी 2-3 इंच तो बढ़ ही गया है। मेरे नितंब भी थोड़े भारी से हो गए हैं और कस भी गए हैं। सच कहूँ तो मेरे नितंबों की थिरकन और कमर की लचक बहुत कामुक हो गई है। मैं उनका आशय और मनसा भली भाँति जानती थी। पर मैं आज इतनी जल्दी वो सब करवाने के मूड में कतई नहीं थी। मैंने अपना एक हाथ पीछे किया और उनके “उसको” पकड़ कर भींच दिया।

प्रेम की एक मीठी सीत्कार निकल गई। उसने मुझे कंधे से पकड़ कर घुमाया और अपने सीने से चिपका कर मेरे नितंबों पर हाथ फिराने लगा।

“मधुर… पलंग पर चलें ?”

“हम्म !”

अक्सर ऐसे मौके पर मैं रोशनी बंद करने को कह देती हूँ पर आज मैंने उन्हें ऐसा नहीं कहा। हम दोनों झट से पलंग पर आकर कंबल में घुस गये। प्रेम तो मुझे कपड़े उतारते हुए देखना चाहता था पर मैंने कंबल के अंदर घुसे हुए ही अपने कपड़े उतार दिए। प्रेम ने भी झट से अपने सारे कपड़े उतार दिए और मेरे ऊपर आकर मुझे अपनी बाहों में कस कर चूमना शुरू कर दिया।

मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर उनके “उसको” पकड़ लिया और अपनी लाडो पर घुमाने लगी। मेरी लाडो तो पहले से ही पूरी गीली हो चुकी थी किसी क्रीम या तेल की ज़रूरत कहाँ थी। प्रेम ने मेरे होंठों को चूमते हुए एक ज़ोर का धक्का लगाया तो उनका पप्पू गच से अंदर चला गया। मेरे मुँह से एक कामुक सीत्कार निकल गई।

प्रेम ने मेरे अधरों को चूमना और उरोज़ों को मसलना चालू कर दिया। वो आँखें बंद किए हौले-हौले धक्के लगाने लगा।

मैं उसका ध्यान फिर से अपने नितंबों और महारानी की ओर ले जाना चाहती थी। मैंने उसके होंठों को अपने दाँतों से थोड़ा सा काट लिया और फिर एक सीत्कार करते हुए अपने पैर हवा में उठा दिए। ऐसा करने से मेरे नितंब भी थोड़े ऊपर उठ गये।

अब प्रेम ने अपना एक हाथ नीचे किया और पहले तो उसने नितंबों पर हाथ फिराया और फिर महारानी के छेद पर अपनी अंगुली फिराने लगा। उस पर चिकनाई तो पहले से ही लगी थी और कुछ लाडो का रस भी निकल कर उसे गीला कर चुका था। प्रेम ने अपनी एक अंगुली थोड़ी सी अंदर डाली।

मैंने ठोड़ा चिहुंकने का नाटक किया,”ओह… प्रेम मेरे साजन … आ…..”

“आ… मेरी स्वर्ण नैना… मेरी जान….” कहते हुए उसने फिर से मेरे होंठ चूम लिए और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा।

मैंने अपनी अपनी लाडो को कस कर अंदर भींच लिया। ऐसा करने से महारानी ने भी साथ में संकोचन किया। मैं जानती थी इस समय प्रेम की क्या हालत हो रही होगी।

हमें आज कोई 10-12 मिनट तो इस प्रेम युद्ध में लगे ही होंगे। प्रेम युद्ध के अंतिम क्षणों में प्रेम मुझे हमेशा घुटनों के बल होने को कहता है। उसे नितंबों पर थपकी लगाना और उनकी खाई में अंगुली फिराना बहुत अच्छा लगता है। मैं आज उसे किसी क्रिया के लिए मना नहीं करना चाहती थी। जब उसने ऐसा करने का इशारा किया तो मैं झट से अपने घुटनों के बल हो गई।

प्रेम अब उठ कर मेरे पीछे आ गया। पहले तो उसने नितंबों पर थपकी लगाई और फिर उन पर दो-तीन बार चुंबन लिया। मेरी लाडो में तो इस समय चींटियाँ सी काट रही थी। मेरा मन कर रहा था कि प्रेम एक ही झटके में अपने पप्पू को अंदर डाल दे और कस कस कर अंतिम धक्के लगा दे।

फिर उसने मेरे नितंबों को चौड़ा किया और अपना मुँह नीचे करके लाडो के चीरे और महारानी के छेद के बीच की जगह को चूम लिया। मेरी तो किलकरी ही निकल गई। पता नहीं प्रेम को ये टोटके कौन सिखाता है।

मुझे तो लगा मेरी लाडो ने अपना धैर्य खो दिया है और अपना रस छोड़ दिया है।

अब प्रेम ने अपने पप्पू को मेरी लाडो की गीली और रपटीली फांकों पर फिराया और फिर उसे सही निशाने पर लगा कर मेरी कमर पकड़ ली। मैं जानती थी प्रेम अब ज़ोर का धक्का लगाने वाला है मैंने भी अपने नितंब ज़ोर से पीछे कर दिए। एक ज़ोर से फच की आवाज के साथ पप्पू अंदर समा गया।

प्रेम कुछ क्षणों के लिए रुका और फिर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। मुझे तो लगा मेरी लाडो में आज कामरस की बाढ़ ही आ गई है। मैंने अपना सिर तकिये पर लगा लिया और एक हाथ से अपनी मदन-मणि को मसलने लगी।

प्रेम कभी धक्के लगाता, कभी मेरे नितंबों पर हाथ फिराता, कभी उन पर थपकी लगता। बीच बीच में वो महारानी के छेद पर भी अपनी अंगुली और अंगूठे को फिराने से बाज़ नहीं आता।

वह आ… उन्ह… कर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाते जा रहा था। मैंने 2-3 बार फिर से लाडो में संकोचन किया तो पप्पू ने भी एक ज़ोर का ठुमका लगाया और फिर कुलबुलाता लावा फ़ूट पड़ा।

प्रेम की गुर्राहट सी निकल रही थी और उसने अपनी कमर को कस कर मेरे नितंबों से चिपका लिया।

मैं धीरे धीरे अपने पैर पीछे करते हुए पेट के बल लेट गई। प्रेम मेरे ऊपर ही लेट गया था। उसने मेरे कानों, गले और पीठ पर चुंबनो की झड़ी लगा दी। थोड़ी देर बाद पप्पू फिसल कर बाहर आ गया तो मुझे अपनी जांघों के बीच गीला गीला लगाने लगा तो मैंने उसे ऊपर से उठ जाने को कहा।

प्रेम की एक अच्छी आदत है, प्रेम युद्ध के बाद हम दोनों ही गुप्तांगों की सफाई ज़रूर करते हैं। अक्सर प्रेम मुझे गोद में उठा कर बाथरूम तक ले जाता है और वहाँ भी मेरी लाडो और नितंबों को छेड़ने से बाज़ नहीं आता। पता नहीं उसे मुझे सू सू करते हुए देखना क्यों इतना अच्छा लगता है। मुझे तो शुरू शुरू में बड़ी लाज आती थी लेकिन अब तो कई बार मैं अपनी लाडो की फांकों को चौड़ा करके जब सू सू करती हूँ तो उस दूर तक जाती उस पतली और तेज़ धार की आवाज़ सुनकर उसका तो चेहरा ही खिल उठता है।

प्रेम तो आज भी मुझे अपने साथ ही बाथरूम चलने को कह रहा था पर मैं आज उसके साथ ना जाकर बाद में जाना चाहती थी। कारण आप सभी अच्छी तरह जानते हैं।

प्रेम तो बाथरूम चला गया और मैंने फिर से कंबल ओढ़ लिया।

कोई 5-7 मिनट के बाद प्रेम बाथरूम से आकर फिर से मेरे साथ कंबल में घुसने लगा तो मैंने उसे कहा “प्रेम प्लीज़ तुम दूसरा कंबल ओढ़ लो और हाँ… वो दूध पी लेना … !”

आज पता नहीं प्रेम क्यों आज्ञाकारी बच्चे की तरह झट से मान गया नहीं तो वो मुझे अपनी बाहों में भर लेने से कभी नहीं चूकता। मैं फिर कंबल लपेटे ही बाथरूम में चली आई। मैंने अपनी लाडो और महारानी को गर्म पानी और साबुन से एक बार फिर से धोया और …

शेष कहानी अगले भाग में !

आपका प्रेम गुरु

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